ढाई साल बाद
एसएसपी खन्ना धुर्व दहिया आईपीएस
-पुलिस फाईल से
पूरे मामले को पढ़ने के बाद एक बात मेरी
समझ में नहीं आ रही थी कि जब गुरदीप सिंह 18 तारीख को अपने काम पर शहर चला गया था
तो फिर दो दिन बाद उसकी लाश अपने ही घर के सामने कैसे पायी जा सकती थी. क्या
गुरदीप शहर गया ही नहीं था, या दो दिन
बाद किसी के बुलावे पर गाँव आया था. पर किसके …? अब इसी सवाल का जवाब
मुझे तलाशना था.
पंजाब के खन्ना में साल 2018 के जुलाई माह में मेरी न्युक्ति बतौर एसएसपी हुई है. इसके पूर्व मैं होशियारपुर, दसूहा में रहा था. 2011 बैच से आईपीएस करने के बाद मेरी पहली न्युक्ति 2014 को लुधियाना में हुई थी. नई सोच,शिक्षानीति,और नई कार्यप्रणाली के साथ जब मैने बतौर एसीपी वहां अपना काम शुरू किया तब शहर की कानून व्यवस्था चरमराई हुई थी. यातायात का तो बहुत बुरा हाल था. सबसे पहले मैने शहर वासियों से मिल-मिलकर अपना परिचय बढ़ाया और जगह-जगह सभाएं कर पुलिस और जनता के बीच की दूरी खत्म करने के प्रयास किये और उन्हें कानून के दायरे में रहकर एक अच्छा नागरिक बनने की सलाह दी. यातायात को सुचारू रूप से चलाने के लिए मैने अपने स्टाफ को कड़े आदेश दे रखे थे. यातायात नियमों का उलन्घन करने वाला कोई नेता हो या कोई अधिकारी. उसे बख्शा ना जाये. और इसी कड़ी में अपनी नौकरी के मात्र 3 माह बाद ही दिसम्बर माह में पंजाब एण्ड हरियाणा हाई कोर्ट के एक जस्टिज की गाड़ी का नो पार्किंग का चलान काटने के बदले में मुझे ट्रांसफर झेलना पड़ा था. लुधियाना से जालंधर-दसूहा-होशियारपुर आदि होते हुए अब जब मैंने खन्ना पहुँच कर एसएसपी का कार्यभार सम्भाला तो अपनी आदत अनुसारमैनें अपने आधीन्स्थ अधिकारिओं को यह सख्त आदेश दिया कि किसी भी मामले में लापरवाई नहीं बरती जाएगी. अपना कार्यभार सम्भालने के बाद सबसे पहले मैने उन बन्द फाईलों को अपना निशाना बनाया जो पिछले 3-4 सालों से बन्द पड़ी हुई थी और उनपर अबतक कोई करवाई नहीं हुई थी. इन ढेरों फाईलों में एक फाईल एक फाईल सवरण कौर की थी. मैने वह फाईल अलग कर उस का बारीकी से अध्ययन किया. सबसे पहले पन्ने पर एक शिकायत दर्ज थी. शिकायतकर्ता 50 वर्षीय सवरण कौर थी. उसके 23 वर्षीय शादीशुदा युवा बेटे की किसीने हत्या कर उसकी लाश को उसीके ही घर के सामने डंगरों वाले बाड़े में फैंक दी थी. सरवन कौर ने शिकायत पत्र में दर्ज अपने बयानों में कुछ इस प्रकार लिखा था
सवरण
कौर पत्नी लक्ष्मण सिंह गाँव लोपो, थाना और तहसील समराला जिला खन्ना की रहने वाली
थी. और अपने पति के साथ ही खेतों पर मेहनत-मजदूरी करती थी. उसकी चार संताने थी दो
लड़के पवित्र सिंह और गुरदीप सिंह. और दो लड़कियां. जो सभी शादीशुदा थे और अपने-अपने
घरों में खुश थे.पवित्र सिंह बड़ा था और
गुरदीप उर्फ़ निका, छोटा था. गुरदीप ने किसी लड़की के साथ लव मैरिज की थी और वह अपनी
पत्नी के साथ लुधियाना में रहता था. गुरदीप जे.बी.सी चलाने का काम करता था. गुरदीप
सप्ताह में या सप्ताह के बीच जब भी मौका मिलता था अपनी माँ को मिलने गाँव चला आता
था. दिनांक 16-11-2015 को भी गुरदीप अपनी माँ से मिलने घर आया था और 2 दिन रहने के
बाद दिनांक 18 को वह अपने कम पर लुधियाना लौट गया था. दिनांक 22-11-2015 की सुबह 6
बजे गुरदीप का बाप लक्ष्मण सिंह अपने घर के सामने बने डंगरों के बाड़े में पशुओं को
चारा डालने के लिए गया तो यह देखके गश खा गया था. बाड़े के सामने उसके जवान बेटे
गुरदीप की लाश पड़ी थी. गुरदीप की किसी ने गला घोंटकर हत्या कर दी थी. उसके गले में
केसरी रंग का पटका बंधा हुआ था. लक्ष्मण ने जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया. उसके
परिवार के साथ-साथ गांववासी भी वहां जमा हो गए थे. इस घटना की सूचना तुरंत थाना
समराला दी गई थी. थाना समराला के तत्कालीन प्रभारी इं मंजीत सिंह सब इं नछत्तर
सिंह के साथ गाँव लोपो पहुंचे थे.घटना का मौका मुआयना करने के बाद उन्होंने मृतक
के परिवार वालों और गांववासियों के बयान दर्ज करने के बाद गुरदीप की हत्या का
मुकदमा अपराध संख्या-203 पर भारतीय दंड विधान सहिंता की धरा 302 / 34 पर दर्ज करके
लाश अपने कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भेज दी थी.
पोस्टमार्टम के बाद मृतक की लाश उसके घरवालों को सौंप दी गई थी. और आगे की करवाई
के नाम पर तफ्तीश जारी है लिखकर फाईल बन्द कर दी गई थी. इं मंजीत सिंह का थाने से
तबादला हो चूका था और शायद नए थाना प्रभारी ने उक्त फाईल को खोलकर देखने की जहमत
नहीं उठाई थी. उसके बाद कई थाना अध्यक्ष वहां आये और गए. गुरदीप की हत्या की फाईल
दबते-दबते नीचे दबकर रह गई थी. इस घटना को लगभग ढाई वर्ष गुज़र गए थे.
फाईल
का पूरी तरह से अध्ययन करने के बाद मैं इस सोच में पड़ गया था कि जब हत्या से दो
दिन पहले 16 तारीख को गुरदीप गाँव से अपने काम पर लुधियाना चला गया था तो फिर 2
दिन बाद उसकी लाश गाँव में कैसे पहुंची थी. क्या वह खुद गाँव आया था या किसीने
उसकी हत्या करने के मकसद से उसे गाँव बुलाया था. पर ऐसा कौन शख्स था.? मैंने तत्कालीन डी.एस.पी. समराला
हरसिमरत सिंह शेतरा,
और एस.एच.ओ. समराला इंस्पैक्टर भुपिन्द्र सिंह को अपने कार्यालय
बुलाकर उक्त फाईल सौंपते हुए कहा था.
‘’
मुझे जल्द से जल्द गुरदीप के हत्यारों का पता चाहिए. और केस की प्रोग्रेस रिपोर्ट
रोज शाम को मेरी टेबल पर होनी चाहिए.’’
इं
भूपिंदर सिंह ने लोपो गाँव में अपना नेटवर्क फैला दिया था. लोपो गाँव में
मेहनत-मजदूरी करने वाले दलितों किसानों के परिवार थे. किसी को फुर्सत नहीं थी. सभी
अपने कामों में व्यस्त थे.फिर इतनी पुराणी बात लोग भूल सी गए थे उन्हें सिर्फ इतना
याद था कि सरवण के बेटे गुरदीप की हत्या हुई थी. इस मामले में ढाई साल तक भले ही
कोई करवाई नहीं हुई थी पर मृतक की माँ अपने बेटे के हत्यारों को पकड़ने के लिए
समय-समय पर दरखास्तें देती रही थी. उसने 4 नाम भी पुलिस को लिखके दिए थे और बेटे
की हत्या के समय चीख-चीख कर उन चारों के नाम भी लिए थे, पर उसकी बातों की ओर किसी
ने ध्यान नहीं दिया था. मैने उन चारों लोगों के नाम अपने किसी ख़ास को सौंपते हुए
कहा था कि इन चारों की पूरी कुण्डी पता करो और साथ में इस बात का भी
पता लगाओ कि उसदिन गुरदीप अपने गाँव किसके बुलावे पर आया था. अगले दो दिनों में
मुझे इस पूरे मामले की तह तक जानकारी मिल गई थी और इस हत्या की योजना का एक
चश्मदीद गवाह भी मेरे हाथ लग चुका था. सारी बातें मैंनें इं भूपिंदर सिंह को बताई
और वह चार नाम देते हुए कहा.
‘’
इनको बुलवाकर पूछताछ शुरू करो.’’
उसी
दिन ही इं भूपिंदर सिंह ने गाँव लोपो के मोहन सिंह पुत्र नाथ सिंह- गुरमुख सिंह
पुत्र जीत सिंह – दविंदर सिंह पुत्र मोहन सिंह और बबू पुत्र नाथ सिंह को थाने
बुलवा लिया था. इन चारों में से एक मोहन सिंह का बेटा था और बाकी दो भाई और भतीजा
थे. ढाई वर्षों बाद जब गुरदीप की हत्या में तफ्तीश शुरू हुई तो सब चौंक गए थे.
काफी देर याद करने का नाटक करने के बाद मोहन सिंह ने बताया था कि लक्ष्मण के बेटे
की मौत तो हुई थी पर उसकी मौत से उनका या उनके परिवार का कोई वास्ता नहीं था.
लेकिन मेरे पास इस बात का पुख्ता सबूत था कि गुरदीप की हत्या के पीछे सिर्फ और
सिर्फ मोहन सिंह का ही वास्ता था. मैंनें काफी कोशिश की थी कि वह प्यार से अपने आप
जुर्म कबूल करके सब कुछ बता दे पर व्ह्व्ह अपनी बातों में मुझे गुमराह करता रहा
था. अंत में मैने उस आदमी को लाकर मोहन सिंह के सामने खड़ा कर दिया जिसके सामने
उसने अपने बेटे और भाई के साथ मिलकर गुरदीप की हत्या करने की योजना बनाई थी. उसका
नाम चंद सिंह था और वह भी लोपो गाँव का एक जट्ट जमीदार था. चंद सिंह को अपने सामने
देखकर मोहन की घिगी बन्ध गई थी. वह बगले झाँकने लगा था. अंत में उसने और अन्य
तीनों ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया था कि उन्होंने ही योजना बनाकर गुरदीप
की हत्या की थी. चारो दोषियों को उसी दिन 5 अगस्त 2018 को अदालत में पेशकर पूछताछ
के लिए पुलिस रिमांड पर लिया गया. विस्तार से की गई पूछताछ क्ले बाद गुरदीप की
हत्या की जो कहानी सामने आई उसमे दोष गुरदीप का अधिक था. भले ही इस मामले में
गुरदीप दोषी था पर मोहन सिंह और उसके साथियों ने मिलकर जो किया वह भी कतई उचित
नहीं था. इस समस्या से निपटने के और भी बहुत रस्ते थे, मोहन इस मामले में पुलिस की
मदद भी ले सकता था. बहरहाल गुरदीप की हत्या के आरोप में मोहन सिंह अपने बेटे, भाई
और भतीजे के साथ हवालात पहुंच गया था.
इंस्पेक्टर भूपिंदर सिंह अपनी पुलिस टीम के साथ दोषी मोहन सिंह को अदालत ले जाते हुए.
गुरदीप
के पड़ोस में मोहन सिंह का घर था. मोहन सिंह भी दलित जाति का मजदूर किसान था. मोहन की एक बेटी थी हरमनदीप कौर जो पास के
गाँव रोपलो स्कूल में पढ़ती थी. अपने जीवन के 16 बसन्त पार कर वह जवानी की दहलीज पर
कदम रख चुकी थी और उसे किसी प्रेमी की तलाश थी. गुरदीप गाँव का बांका नौजवान था.
पड़ोसी होने के नाते बचपन से ही हरमन और गुरदीप साथ-साथ खेले थे और दोनों परिवारों
का एक दूजे के घर काफी आना-जाना था. हरमन जब जवान हुई तो उसका झुकाव गुरदीप की तरफ
हो गया था जबकि गुरदीप ने लुधियाना काम करना और रहना शुरू कर दिया था. लेकिन वह जब
भी गाँव आता तो हरमन को अपने आसपास ही मंडराते पाता था. इस कारण उसकी भावनाएं भी
जागने लगी थी. फिर अक्सर मौका देखकर दोनों एक दूसरे को मिलने लगे. हरमन के लिए
गुरदीप को मिलने के लिए किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता था.वह स्कूल से छुटी
मारकगुरदीप के साथ सैर सपाटे पर चली जाया करती थी. धीरे-धीरे दोनों में खूब याराना
हो गया था और इन के प्यार के चर्चे गाँव में भी होने लगे थे. उड़ते-उड़ते यह बात
मोहन सिंह को भी पता चल गई थी. उसने छुपकर जब अपनी बेटी की निगरानी की तो असलियत
सामने आ गई थी. फिर एक दिन स्कूल से संदेशा आया कि हरमनदीप कौर कई दिनों से स्कूल
में गैरहाजिर है. उसदिन मोहन ने हरमन को खूब फटकारा. साथ ही उसने गुरदीप के घर
जाकर उसकी माँ और बाप को खूब खरी खोटी सुनाई. साथ ही धमकी भी दी कि अगर गुरदीप ने
अपनी आदत ना बदली तो नतीजा भुगतना पड़ेगा. गलती उनके बेटे गुरदीप की थी सो बात को
खत्म करने के लिए सरवन कौर और लक्ष्मण सिंह ने मोहन सिंह के पैर पकडकर माफ़ी मांगी.
कुछ दिन के लिए मामला ठंडा पद गया था. एक दिन मोहन को गाँव वालों के माध्यम से पता
चला कि गुरदीप के पास हरमन की अश्लील फोटोएं है. और वह गाँव में लोगो को बताता फिर
रहा है कि अगर मोहन ने उसे हरमन से मिलने के लिए रोका तो वह फोटोएं इंटरनेट पर
डालकर उन्हें बदनाम कर देगा. यह बात सुनकर मोहन के पैरों तले से जमीन खिसक गई थी.
वह भले ही गरीब थे पर गाँव में उनकी भी एक इज्जत और मान मर्यादा थी. यह बात वह
कैसे बर्दाश्त कर लेते. मोहन सिंह ने उसी दिन गुरदीप के घर जाकर उसके माँ-बाप से
बात की. उन्होंने मोहन को आश्वासन दिया कि यदि ऐसी कोई फोटो है तो वह गुरदीप से
लेकर उसे सौंप देंगे गाँव की बहन बेटी
सबकी सांझी होती है. पर गुरदीप किसी कीमत पर फोटो देने के लिए तैयार नहीं था. इस
बात को लेकर मोहन और लक्ष्मण के परिवार में कई बार झगड़े भी हुए पर गुदिप ने वह
फोटो नहीं दी थी. गुरदीप को किसी भी तरह मानता ना देखकर मोहन सिंह को अपनी इज्ज़त
बचाने का एक ही रास्ता दिखाई दिया था. वह रास्ता था गुरदीप की हत्या कर देने का.
ना रहेगा सांप, ना बजेगी बांसुरी. अपने भाई और बेटे के साथ मिलके मोहन ने गुरदीप
की हत्या की योजना बने और इस बारे में चंद सिंह से मशविरा किया. चंद सिंह ने तो
स्पष्ट कहा था कि हत्या किसी समस्या का समाधान नहीं है. तब मोहन सिंह ने कहा था
‘’अब जो होगा देखा जायेगा.’’
अपनी
योजना अनुसार दिनांक 21-11-2015 की शाम मोहन ने अपनी बेटी हरमन से गुरदीप का फोन
नम्बर लेकर उसे फोनकर गाँव के बाहर मिलने के लिए बुलाया था. मोहन ने गुरदीप को कहा
था अगर तुम फोटो वापिस नहीं लौटाना चाहते तो हरमन से शादी कर लो. अगर हरमन से शादी
करनी है तो रात के 9 बजे तक गाँव के अड्डे पर मिलो. यह बात सुनकर गुरदीप झट से
तैयार हो गया था, वह ठीक 9 बजे अड्डे पर पहुंच गया. नवंबर की हल्की-हल्की ठण्ड का
महिना था. वैसे भी गांवों में दिन छिपने के पीछे लोग अपने-अपने घरों में दुबक जाते
है. जिस समय गुरदीप अड्डे पर पहुंचा तो उस समय चहूँ और सन्नाटा पसरा पड़ा था. बात
करने के बहाने वे चारों उसे सुनसान खेत में ले गए थे. पर हत्या करने से पहले मोहन
सिंह डर गया था. इसलिए हत्या करने से पहले उसने एकबार गुरदीप को अपनी इज्ज़त का वास्ता देते हुए फोटो लौटने
के लिए कहा. गुरदीप ने उस समय शराब पी राखी थी. फोटो लौटने की बात सुनकर जब गुरदीप
हत्थे से उखड़ गया और धमकी देने लगा तो मोहन के बर्दाश्त की सीमा भी पार हो गई थी.
चारों ने पकडकर उसे जमीन पर पटक दिता और उसी के सिर पर बंधे पटके को उतरकर उसके
गले में डाला और अपने साथ लाई हुई टैलीफोन की तार से गला घोंट दिया था. गुरदीप की
हत्या करने के बाद चारों ने उसकी लाश को खेत से उठाकर उसके घर के सामने डाल दिया.
इस मुकदमे की जांच पूरी गहराई, तकनीकी ढंगों और खुफिया सूत्रों के साथ की गई थी. इसी
कारण इस अंधे कत्ल की गुत्थी को ढाई
वर्षों बाद सुलझाया जा सका था. रिमांड के
बाद 6 अगस्त को गुरदीप की हत्या के आरोप में मोहन सिंह पुत्र नाथ सिंह- गुरमुख
सिंह पुत्र जीत सिंह – दविंदर सिंह पुत्र मोहन सिंह और बबू पुत्र नाथ सिंह को
अदालत में पेश कर जेल भेज दिया गया था.
--प्रस्तुति –हरमिन्दर कपूर



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