-------------------------------------------------किसी पर भरोसा ठीक नहीं----------
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नेत्रहीन टीचर इंदरजीत कौर
रविवार का दिन था. मुद्दत बाद आज पांचों
बहन-भाई एक साथ अपनी बड़ी बहन इंदरजीत कौर के घर जमा हुए थे. इंदरजीत कौर के 6
भाई-बहन थे. सबसे बड़ी जगजीत कौर थी जिसकी मृत्यु काफी अरसा पहले ही हो चुकी थी.
उससे छोटी दूसरे नम्बर पर स्वंय 68 वर्षीय इंदरजीत कौर थी. तीसरे नम्बर पर सतनाम
कौर थी जो अपने पति और बच्चों के साथ अमृतसर में रहती थी. चौथे नम्बर पर गुलज़ार
सिंह था जोकि इन्दर की ही कालोनी की पिछली गली में रहता था. पांचवें नम्बर पर
सतिंदर कौर थी. वह अपने बच्चों के साथ बटाला में रहती थी और इन सब भाई-बहनों से
छोटा था कंवलजीत सिंह जो कि अपनी बीवी-बच्चों के साथ दिल्ली में रहता था. इंदरजीत
के घर पर इन सभी भाई-बहनों का जमवाड़ा कंवलजीत सिंह के दिल्ली से अमृतसर आने की
ख़ुशी में हुआ था. एक अरसे बाद सभी भाई-बहन आपस में मिलकर बड़े खुश हुए थे. इस
भागमभाग की जिन्दगी में आजकल अपनों से
मिलना तो दूर किसी के पास मरने की भी फुर्सत नहीं होती है. इसी लिए लोग अपनों से
दूर होते जा रहे है. बहरहाल सभी भाई-बहन अधेडायु थे. और इस उम्र में भी वह अपने
बचपन की खुशियों से यूँ बंचित नहीं रहना चाहते थे. सो सबने मिलकर खूब हंसी-मजाक
कर बचपन की यादों को ताज़ा किया. अंत में
अगले माह आने वाले त्यौहार रक्षाबंधन की बात चल पड़ी थी कि यह त्यौहार कहाँ और किसके घर मनाया जाए. इस मुद्दे पर सभी ने
अपनी-अपनी राय पेश की अंत में तय हुआ था कि रक्षा बंधन के त्यौहार पर सभी बहन- भाई
कंवलजीत के घर दिल्ली जाएँगे और इसी बहाने दिल्ली भी घूम लिया जाएगा. यह बात 20
जुलाई 2018 की है. अगले दिन सभी लो अपने-अपने घरों को चले गए थे.
इंदरजीत कौर के पति का नाम स्वर्गीय
जोगिन्दर सिंह था. अरसा 50 वर्ष पूर्व इन्दर की शादी जोगिन्दर के साथ हुई थी. शादी
के बाद इन दम्पति की कोई संतान नहीं थी. अब तो जोगिन्दर सिंह की मृत्यु को भी एक
अरसा गुज़र चूका था. इंदरजीत कौर बचपन से ही नेत्रहीन थी. पर अपनी कार्यकुशलता और
बुद्धि के बल पर उसने अपने आप को कभी किसी का मौताज नही बनने दिया था. अपनी पढ़ाई के साथ उसने संगीत
में विशारद हासिल की और अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद बाबा दीप सिंह कन्या
विद्यालय अमृतसर में बतौर संगीत अध्यापिका के रूप में नौकरी कर ली
थी. संतानहीन होने के कारण वह बच्चों से
अधिक प्रेम और स्नेह करती थी. नेत्रहीन होने के बावजूद वह अपनी प्रतिभा का हुनर बच्चों को सिखलाने के कारण पूरे स्कूल में प्रसिद्ध थी. स्कूल का हर बच्चा
इन्द्रजीत कौर के नाम से वाकिफ था, और उनकी
ह्रदय से इज्जत करता था. साल 2012 में इंदरजीत कौर स्कूल से सेवानिवृत हो गई थी और
इन दिनों घर पर ही रहकर अपने पुराने विद्यार्थियों और गरीब बच्चों को मुफ्त में
संगीत की शिक्षा दिया करती थी. अन्य दिनों की तरह
दिनांक 24 जुलाई को भी वह रात का खाना खाने के बाद अपने कमरे में जाकर सो
गई थी.
घटनास्थल पर पुलिस अधिकारी
अगली दिन
25 जुलाई की सुबह जब केवल डेयरी पर काम
करने वाला नौकर अनिल हर रोज की तरह गली में दूध देने के लिए आया तो उसने इन्द्रजीत
कौर का दरवाजा खटखटाया, मगर काफी देर तक दरवाजा खटखटाने पर
जब दरवाजा नहीं खुला तो वह कुछ हैरान हुआ
था क्योंकि पिछले कई सालों से वह इंदरजीत कौर के घर दूध देने आता था. आंधी-तूफान
हो या बरसात. इंदरजीत कौर अपने समय पर हाथ में दूध का बर्तन लिए दरवाज़े पर उसका
इंतजार करते मिली थी. बीमार होने के बावजूद भी वह दूध लेने दरवाज़े तक पहुँच जाया
करती थी. फिर आज ऐसा क्या हुआ जो अभी तक दरवाजा भी नहीं खुला. अपने मन ही मन सोचता
हुआ वह दरवाजे का कुंडा खोलकर अंदर चला गया, क्योंकि काफी वर्षों से वह उनको दूध देने के लिए आया करता था। उसने अंदर
जाकर देखा तो इन्द्रजीत कौर बिस्तर पर चित गिरी पड़ी थी. उसने निकट जाकर आवाज़ दी
पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो वह
घबराकर कर साथ वाली गली में रह
रहे इंदरजीत कौर के भाई गुलजार सिंह के घर
चला गया और उनको बताया कि माँ जी बेहोश
पड़ी हुई हैं. सुनते
ही इंदरजीत का भाई गुलजार सिंह और
उसकी पत्नी पिंकी दौड़ते हुए इंदरजीत के घर
पहुंचे. कमरे में पहुंच कर उन्होंने देखा कि अलमारी टूटी हुई थी
और इंदरजीत कौर के मुंह पर तकिया रखा हुआ था.
इन्द्रजीत कौर के भारी वजन के टॉपस जोकि उनके कानों में थे, उन्हें बेरहमी से खींचकर निकाला
गया दिख रहा था. हाथों में 2 सोने की भारी चूडिय़ां
नहीं थी , उनकी जगह बाजुओं पर खरोंचों के निशान थे ,
अलमारी में से एक हार,
अंगुठिया और कैश गायब था.
उन्हें यह समझते देर नहीं लगी थी कि लुट
के इरादे से उनकी बहन की हत्या की गई थी.
उन्होंने पहले झकझोर कर इन्दर जीत कौर को उठाने की कोशिश की बाद में नब्ज़ देखने पर पता चला था कि जैसे उनकी
मृत्यु हुए काफी समय बीत चुका है. तो घबराकर उन्होंने जल्दी से 100
नंबर पर फोन किया, मगर 100 नंबर पर 15 मिनट तक फोन करने पर भी किसी ने फोन नहीं
उठाया तो उन्होंने 108 नंबर पर डायल किया कि शायद उनकी
सांसें बाकी हों, मगर डायल 108 पर भी किसी ने फोन नहीं
उठाया. इस बिच वह मुहल्ले के डाक्टर को बुलाकर यह पुष्टि कर चुके थे कि उनकी बहन
की हत्या हो चुकी है. 10:30 बजे थाना डिविजन-बी अंतर्गत आने
वाली पुलिस चौकी शहीद ऊधम सिंह नगर के इंचार्ज भूपिंदर सिंह उनके घर आए और पूछताछ की साथ ही घटना की सूचना
उन्होंने थाना डिविजन-बी प्रभारी इं सुखबीर सिंह व अपने उच्च अधिकारीयों को भी दे
दी थी. सूचना मिलते ही इं सुखबीर सिंह एएसआई भूपिंदर सिंह, दलजीत सिंह, लखविंदर
सिंह हवलदार गुरमेज सिंह, पवन कुमार, और गुलज़ार मसीह और क्राइम टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए
थे. इंदरजीत कौर का मकान नम्बर
एल-5/631 अमृतसर शहर के भीडभाड़ वाले
इलाके शहीद ऊधम सिंह नगर बाजार नं. 5 की बंद गली में था. बंद गली होने के कारण उस में बाहर के लोगों का
आना-जाना ना के बराबर था. कोई भूला-भटका मुसाफिर ही गलती से उस तरफ आ जाए तो बात
अलग थी.
प्रथम तफ्तीश में इं सुखबीर सिंह को पता
चला की इंद्रजीत कौर उस घर में कई वर्षों
से अकेली रहती थी. उसकी हत्या लूट के
इरादे से की गई थी और यह किसी भेदी या परिचित आदमी का ही काम था जिसने पहचाने जाने
के डर से लूट के साथ-साथ इंदरजीत की हत्या
की थी. इंदरजीत कौर साल 2012 में सरकारी स्कूल से बतौर अध्यापक रिटायर्ड हो
चुकी थी. उसे पेंशन में हर माह लगभग 40 हजार रूपए मिलते थे. पति की भी कुछ समय पहले मौत हो गई और संतान
नहीं होने के कारण वह घर में अकेली रहती थी. वारदात को अंजाम देने वालों के लिए वह
सॉफ्ट टारगेट थी. बदमाशों ने रात को घर में घुसकर पहले उसकी हत्या की होगी और बाद में वो लोग
घर में रखी नकदी और लाखों रुपये के सोने के गहने लेकर फरार हो गए. घटना के
बारे में पता चलते ही पुलिस कमिश्नर अमृतसर
सुधांशु शेखर श्रीवास्तव, डीसीपी जगमोहन सिंह ,
एडीसीपी जगजीत सिंह वालिया और डीसीपी इंवैस्टीगेशन कई थानों के
प्रभारी घटना स्थल पर पहुंच गए थे.
मौकाए वारदात पर ट्रेनी डॉग की सहायता ली
गई और कई जगह से एक्सपर्टों ने फिंगरप्रिंट भी उठाए थे. काफी खोज बीन करने पर भी
घटनास्थल से को ऐसा सुराग नहीं मिला था जिससे हत्यारों तक पहुंचा जा सकता. बहरहाल
मृतका के भाई गुलज़ार सिंह अरोड़ा के बयानों पर अपराध संख्या 105 पर दिनांक-25-8-7
2018 को इंदरजीत कौर की हत्या और घर में हुई लूटपाट का मुकदमा दफा 306 और 120 बी
के तहत दर्ज कर इं सुखबीर सिंह ने लाश का पंचनामा कर पोस्टमार्टम
के लिए जिला अस्पताल भेज दी और आगामी तफ्तीश में जुट गए. मामले की जाँच के
दौरान उन्होंने क्षेत्र के कई संदिग्ध
युवकों को राउंडअप किया. जेल में और जेल
के बाहर रहने वाले उन सभी बदमाशों से पूछताछ की जो इस प्रकार की वारदातों को अंजाम
देने में निपुण थे. पर इंदरजीत की हत्या का कहीं कोई सुराग नहीं मिला था. इस तरफ
से निराश होकर इं सुखबीर सिंह ने अपनी जाँच-पड़ताल का दायरा मृतका के घर के आसपास
उसके जानने वाले लोगों की ओर फैलाया. हर उस आदमी-औरत पर कड़ी नजर राखी गई जिसका
मृतका के घर आना-जाना था. खोजबीन करने पर एक ऐसा नाम उभर कर सामने आया जिसका ना केवल
मृतका के घर काफी आना- जाना था बल्कि वह उसके रूपए पैसों का भी पूरा हिसाब रखता
था. उसका नाम दविंदर सिंह था.
दविन्द्र सिंह सुल्तानविंड अमृतसर के मेन बाज़ार में मकान संख्या-4632 में रहता था और मृतका की सहेली सुदेश का पति था,
जो स्कूल में दोनों बच्चों को पढ़ाया करती थी और दविन्द्र सिंह पेशे से
वकील है और सहानुभूति रखने के कारण उसका मृतका के घर में काफी आना जाना था. वह
उनके बैंकों का कार्य भी किया करता था. दरअसल
मृतका के भाई- भाभी ने बताया था कि इंदरजीत कौर को 30 लाख रुपए
रिटायरमैंट पर मिले थे. उनकी रिटायरमैंट वर्ष 2012 में हुई
थी और उनकी पैंशन 40 हजार रुपए थी. वह
अकेली ही रहती थी और खर्च भी अकेली ही करती थी. उसने अपना लाखों रुपया ब्याज पर दिया हुआ था, जिसका
ब्याज हर माह दविन्द्र सिंह लाया करता था. किन-किन लोगों को यह पैसा ब्याज पर दिया
गया था और किन-किन लोगों से पैसा और ब्याज
लेना था इसकी सारी जानकारी दविन्द्र सिंह
को ही थी. मृतका का काफी पैसा कमेटियों में भी लगा हुआ था. पैसा बढ़ाने के लिए इन्द्रजीत कौर ने भारी-भारी
कमेटियां भी डाल रखी थी. यह सारा लेखा जोखा दविंदर के पास था. ऐसे में आशंका
जताई गई
कि कहीं ब्याज पर दिया पैसा तो हत्या का कारण नहीं है? बहरहाल दविंदर को पुचत के लिए थाने बुला लिया गया था. और उससे बड़ी गहराई
से पूछताछ की गई थी पर वह इस मामले में
बेगुनाह साबित हुआ था. उसके पास इंदरजीत कौर के पैसे का पाई-पाई का पूरा हिसाब था.
दविंदर से पूछताछ के बाद पुलिस एक बार फिर से अँधेरी गलियों में खो गई. इस बीच
पुलिस ऐसे सुनारों पर भी नज़र रखे हुई थी
जो चोरी चक्कारी का माल खरीदते थे. पुलिस को आशा थी की लुटेरे लूटा हुआ माल बेचने
सुनार के पास जरूर आएँगे.
पुलिस हिरासत में अभियुक्ता सुमन
इं सुखबीर सिंह का अगला निशाना थी
सुखी. इंदरजीत कौर ने अपनी देखभाल, खाना बनाना,
कपड़े धाना, सफाई करना इत्यादि काम के लिए
सुखी नाम की महिला कर्मचारी को अपने पास
रखा हुआ था. जो 2 हजार रुपए महीना लेकर काम किया करती थी.
दविंदर के बाद एक सुखी थी जो उस घर के चप्पे-चप्पे से परिचित थी. इं सुखबीर सिंह
ने सुखी के बारे पता लगवाया तो मालूम हुआ कि सुखी का असली नाम सुरजीत कौर है वह
बलबीर सिंह की पत्नी है और तरनतारन रोड
पर रायल
होटल के पास रहती थी. सुखी को थाने बुलाकर महिला पुलिस अधिकारी के समक्ष
पूछताछ की गई तो वह निर्दोष साबित हुई थी. इसके बाद इं सुखबीर सिंह ने अपनी तफ्तीश
का रुख रिश्तेदारों और ख़ास परिचितों की ओर मोड़ दिया.
मृतका
इंदरजीत कौर का निकट रहने वाला भाई पहले केबल का काम करता था पर बीमारी के
चलते अब वह पिछले काफी अरसा से घर पर ही
रहता था. अन्य रिश्तेदार भी दूर-दूर रहने वाले थे और अच्छी हैसियत में थे. इं सुखबीर सिंह की समझ
में यह नहीं आ रहा था कि ऐसा कैसे हो सकता है कि इंदरजीत के घर किसी ने किसी को
आते-जाते हुए नहीं देखा था. ऐसा मुमकिन नहीं हो सकता था. इस वारदात को अंजाम देने बाहर से कोई नहीं आया
था. जो कोई भी था वह गली- महौल्ले से था.
भले ही वारदात को अंजाम देने के लिए आदमी बाहर से बुलाए गए हों पर साजिशकर्ता कोई गली का ही हो सकता था, उन्होंने एक बार नए
सिरे से इस पूरे घटनाक्रम को समझना शुरू किया और मौहल्ले के हर घर पर नज़र रखवाई और
उनकी पूरी कुण्डली को खंगाला.
इंदरजीत कौर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई
थी. रिपोर्ट के अनुसार दम घुटने के कारण उसकी मौत हुई थी. शव उनके परिजनों के
हवाले कर दिया गया था. मृतका के अंतिम संस्कार में बहुत भीड़ थी. उसके एक दिन पहले मृतका को अंतिम
बिदाई देने के तौर पर क्षेत्र के सभी स्कूल बंद किये गए थे. यहाँ एक
ऐसी बात थी जो इं
सुखबीर सिंह को खटक गई थी. मृतका की गली में रहने वाला बबला नामक आदमी इस अंतिम यात्रा में शामिल नहीं
हुआ था. देखने को तो यह एक साधारण सी बात थी पर इं सुखबीर को इसके पीछे का मकसद
दिखाई दे गया था. इन्द्रजीत कौर के कुछ
ही दूरी में किराए पर रहने वाला बबला घर-दुकानों पर सफेदी करने का कार्य करता था.
उसका मृतका के घर पर काफी आना-जाना था. भला ऐसा कैसे हो सकता है कि जहाँ एक तरफ
अंतिम यात्रा में सैकड़ों लोग आये थे.
वहीँ बबला जोकि इस समय फरार बताया जा रहा
था नहीं आया था. इं सुखबीर सिंह ने बबला के बारे में और जानकारी मालूम की तो पता
चला कि वह वारदात वाले दिन से ही फरार है और जिस मकान से वो फरार हुआ था पहले वह मकान उसकी माता ने किराए पर लिया था और
वह मृतका इन्द्रजीत कौर के घर नौकरानी का काम किया करती थी. इस कारण बबला का मृतका के घर आना जाना लगा रहता
था और उसने 3 बार उस घर की सफेदी भी की
थी. इसलिए वह घर के चप्पे-चप्पे से वाकिफ था. बबला का असली नाम रणजीत सिंह था वह
अपनी पति सुमन के साथ गई मे ही किराये के मकान में रहता था. यह दंपत्ति गांव
चितौड़गढ़, फतेहगढ़ चूड़ियां गुरदासपुर का रहने वाला है और शहीद ऊधम सिंह नगर में किराए
के मकान में रह रहा है. घर की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी और उसके सिर पर हजारों
रुपये का कर्जा भी था. इं सुखबीर सिंह ने
तुरंत बबला के घर पर रेड कर दी . पर वह
पहले ही फरार हो चूका था. जब उसकी पत्नी से पूछताछ की गई कि उसका
पति बबला कहां हैं तो उसने बताया कि
उसे मालूम नहीं वह कहां गए है. वह घर में खर्चा भी नहीं दे गए है और उसके पास
मात्र 50 रूपए है. पुलिस द्वारा जब बबला
के घर में तलाशी ली गई तो 6 मोबाइल फोन, 1 लैपटॉप व 500-500 रुपए के 15 हजार रूपए के नोट बरामद
किए गए, जबकि उसकी पत्नी ने कहा था कि मेरे पास केवल 50
रुपए हैं. इं सुखबीर सिंह ने सुमन को हिरासत में ले लिया और थाने ले
आये. पूछताछ के दौरान सुमन ने इंदरजीत कौर की हत्या और उसके घर हुई लूट के अपराध
को स्वीकार करते हुए बताया कि उन्हें पता
था कि इंदरजीत कौर अकेली है और उसके घर लाखों का सोना और नगदी रखी है. बबला का काम
पिछले काफी महीनों से नहीं चल रहा था. उसके सिर पर देनदारी थी और लेने वाले दिन
रात तकाजा कर-कर उसे धमका रहे थे इसलिए
उन्होंने लूट की योजना बनाई. रात के समय जब पूरा मोहल्ला सो गया तो बबला इंदरजीत कौर के
घर में दाखिल हुआ. वह यह बात अच्छी तरह से जनता था कि जाग जाने पर इंदरजीत कौर उसे
पहचान लेगी. क्योकि इंदरजीत की सेंथ बहुत तेज थी वह किसी चीज़ को सूंघकर उसका नाम
बता देती थी. अलमारी तोड़ते समय जो शोर होगा उससे इंदरजीत का जाग जाना लाजमी था सो
वह घर से ही उसकी हत्या की योजना बना कर गया था.
घर में दाखिल होकर सबसे पहले उसने सोई हुई इंदरजीत के मुंह पर तकिया रख उसे
तबतक दबाता रहा जब तक कि उसके प्राण नहीं
उड़ गए थे. इसके बाद उसने अलमारी में
रखे 24 हजार रूपए
लूट लिए और इंदरजीत के पहने गहने उतार लिए थे.
जब बबल वारदात को अंजाम दे रहा तो सुमन घर की छत पर खड़ी होकर निगरानी कर
रही थी, और वह लगातार अपने पति के संपर्क में थी. लूटे
हुए 24 हजार
रुपयों में से 7 हजार
रूपए बबला ने राणा नाम के व्यक्ति को उधार
वापिस लौटाया था. बाकि के 15 हजार रूपए पुलिस ने बरामद कर
लिए है.
तमाम पुलिस करवाई पूरी करने के बाद और एक दिन
के रिमांड की समाप्ति पर सुमन को दिनांक-29 जुलाई को अदालत में पेश कर जिला जेल
भेज दिया गया था. बबला अभी तक पुलिस की पकड़ से दूर था पुलिस बड़ी तेज़ी से उसकी तलाश
में जुटी हुई है.
( पुलिस सूत्रों पर आधारित कथा का नाट्य
रुपान्तरण )
--साहिल कपूर



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