इक ओंकार  
सभी मित्रों को दीपावली की शुभ कामनाएं 
*मीरी-पीरी के मालिक और बंदी छोड़ गुरु*

*श्री हरगोबिन्द सिंह जी*

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हाँ जो प्रसंग बताया जा रहा है वह कोई नया नहीं है. अधिकांश लोगों ने पढ़ा और सुना होगा. मेरा उदेश्य मात्र इतना है कि मैं आने वाली पीढ़ी को अपने गुरुओं के उन बलिदानों से परिचय करवा सकूं जो उन्होंने हम लोगों के लिए इसलिए किये थे ताकि हम सुखी और खुशहाल जीवन व्यतीत कर सके. हम अपने गिरेबान में झांककर क्या यह बात पूरे विशवास के साथ कह सकते हैं कि हम गुरुओं के बताये हुए मार्ग पर चल रहे है.? चिट्टे जैसा जानलेवा नशा घर-घर में बेचा और पिया जा रहा है. सैकड़ों नौजवान समय से पहले ही काल के ग्रास बन गए है. अपने पंजाब में एक गाँव तो ऐसी भी है, जहाँ केवल विधवाएं ही रहती है. कोई पुरुष बचा ही नहीं. क्या ऐसा करके हम और आप गुरुओं की दी गई कुर्बानियों का त्रिस्कार और उनकी बेअदबी नहीं कर रहे है. उनकी बनाई हुई मरियादाओं के साथ खिलवाड़ नहीं कर रहे है. ग्वालियर के किले में कैद गुरु श्री हरगोबिन्द साहब जी ने अकेले रिहा होना पसंद नहीं क्या था. बल्कि उन्होंने उन 52 राजाओं को भी कैद से आज़ादी दिलवाई थी जिन्हें मुगल बादशाह जहाँगीर ने नशे का गुलाम बनाकर अपनी कैद में रखा हुआ था. यह सोचने का सही समय और विषय है कि हम हमारे गुरुओं की दी गई कुर्बानियों के साथ इंसाफ कर रहे है.?    

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सिख गुरु साहब श्री हरगोविंद साहिब ने आज ही के दिन अपने साथ जहांगीर की कैद में ग्वालियर किले से 52 राजाओं को आजाद कराया था. इस स्मृति को संजोए रखने के लिए यहां गुरुद्वारा बनाया गया था, जिसे नाम दिया गया है गुरुद्वारा ‘’दाता बंदी छोड़ साहिब’’ आज के दिन दीपावली पर ये गुरुद्वारा जगमगा उठता है, यहां मेला लगाया जाता है. अमृतसर साहब के स्वर्ण मंदिर को लाइटों से सजाने के बाद यहाँ आतिशबाजी की जाती है जो देश-विदेश में मशहूर है. दीपावली के इस पर्व को सिख धर्म में प्रकाशपर्व के रूप में मनाया जाता है.



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दीपावली का त्योहार हिन्दू, जैन, बौद्ध और‍ सिख धर्म का सम्मलित त्यौहार है. इसे संपूर्ण भारत वर्ष में मनाया जाता है. खुशियों को बढ़ाने और जीवन से दुखों के अंधकार को मिटाने का यह त्यौहार दुनिया का सबसे अच्छा और सुंदर त्यौहार माना जाता है. इस त्योहार को ईसा पूर्व 3300 वर्ष पूर्व से लगातार मनाया जाता रहा है. सिंधु घाटी की सभ्यता के लोग भी इस त्यौहार को मनाते थे.
इस त्यौहार की शुरूआत मर्यादा परषोतम भगवान राम के 14 वर्ष बनवास पूर्ण करने के पश्चात अपने गृह नगर अयोध्या लौटने की ख़ुशी में हुई थी. इस दिन भगवान राम ने लंकापति रावण का वधकर विजय प्राप्त की थी. अधर्म पर धर्म की विजय. वहीं बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध जब 17 वर्ष बाद अनुयायियों के साथ अपने गृह नगर कपिल वस्तु लौटे तो उनके स्वागत में लाखों दीप जलाकर दीपावली मनाई थी. साथ ही महात्मा बुद्ध ने 'अप्पों दीपो भव' का उपदेश देकर दीपावली को नया आयाम प्रदान किया था.


 दूसरी ओर जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर ने दीपावली के दिन ही बिहार के पावापुरी में अपना शरीर त्याग दिया था. कल्पसूत्र में कहा गया है कि महावीर-निर्वाण के साथ जो अन्तर्ज्योति सदा के लिए बुझ गई है, आओ हम उसकी क्षतिपूर्ति के लिए बहिर्ज्योति के प्रतीक दीप जलाएं.  ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में रचित कौटिल्‍य के अर्थशास्त्र के अनुसार आमजन कार्तिक अमावस्या के अवसर पर मंदिरों और घाटों पर बड़े पैमाने पर दीप जलाकर दीपदान महोत्सव मनाते थे. साथ ही मशालें लेकर नाचते थे और पशुओं खासकर भैंसों और सांडो की सवारी निकालते थे. मौर्य राजवंश के सबसे चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने दिग्विजय का अभियान इसी दिन प्रारम्भ किया था. इसी खुशी में दीपदान किया गया था.
तीसरी ओर सिख धर्म में इस पर्व का एक विशेष महत्व है. इसे प्रकाशपर्व के रूप में मनाया जाता है अमृतसर की पावन धरती पर 1577 में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था. और, इसके अलावा 1618 में दीवाली के दिन सिक्खों के छठे गुरु श्री हरगोबिन्द सिंह जी को बादशाह जहांगीर की कैद से रिहा किया गया था. श्री गुरु हरगोबिन्द साहब जी सिखों के छठवें गुरु थे. उनका जन्म बडाली अमृतसर,  भारत में 14 जून, सन् 1595 में हुआ था. वे सिखों के पांचवे गुरु श्री अर्जुन देव जी के पुत्र थे और उनकी माता का नाम गंगा था.
सिखों के गुरु के रूप में गुरु जी का कार्यकाल सभी गुरु साहिबानों में सबसे अधिक था. उन्‍होंने 37 साल, 9 महीने, 3 दिन तक अपने उत्‍तरदायित्‍व का निर्वहन किया था. गुरु श्री हरगोबिन्द सिंह जी गद्दी पर दो तलवारे पहन कर बैठे थे.  उन्होंने मीरी-पीरी की शुरुवात की और  सर पर कलगी सजाई .यह मीरी और पीरी की दोनों तलवारें उन्हें बाबा बुड्डा जी ने पहनाई थी. इसी लिए गुरु जी को मीरी और पीरी का मालिक कहा जाता है ,गुरु नानक जी से लेकर गुरु अर्जुन देव जी तक सारे गुरुओ को पीरी का मालिक कहा जाता है. अर्थात अध्यात्म वंदना. लेकिन गुरु हरगोबिन्द जी साहब ने उस समय के हालात को और मुगलों के बढ़ते अत्याचारों को देखते हुए ही शस्त्र उठाने का फैसला किया था. गद्दी पर बैठ कर गुरु जी ने आने वाली संगत को कहा की वह एक फ़ौज तैयार करना चाहते है.जो आने वाले समय मै जुल्मो से लड़ सके.  इसलिए अब आप  भेटा में अच्छे शस्त्र और घोड़े दे. कुछ ही समय में दूर दूर से नौजवान आने लगे और सेना मे भर्ती होने लगे 

गुरु जी ने अपना ज्यादातर समय युद्ध प्रशिक्षण एव युद्ध कला में लगाया तथा बाद में वह कुशल तलवारबाज, कुश्ती व घुड़सवारी में माहिर हो गए थे. उन्होंने ही सिक्खों को अस्त्र-शस्त्र का प्रशिक्षण लेने के लिए प्रेरित किया व सिक्ख पंथ को योद्धा चरित्र प्रदान किया. वे स्वयं एक क्रांतिकारी योद्धा थे.जिनका उदेश्य गरीब, मजलूम और असहाय लोगों को मुगलों के अत्याचारों से मुक्त कराना था. इसी उदेश्य के मद्दे नज़र गुरु जी ने मुगलों के विरोध में अपनी सेना संगठित की और साथ ही अपने शहरों की किलेबंदी कर जनता को सुरक्षित रखने का प्रयास किया था. उन्होंने अकाल बुंगे की स्थापना की. बुंगे का अर्थ होता है एक बड़ा भवन जिसके ऊपर गुंबज हो. उन्होंने अमृतसर में  स्वर्ण मंदिर के सम्मुख श्री अकाल तख्त का निर्माण किया जिसे ईश्वर का सिंहासन माना जाता है. अब वर्तमान में इसी भवन में अकालियों की गुप्त गोष्ठियां होने लगीं. इनमें जो निर्णय होते थे उन्हें गुरुमतां अर्थात् गुरु का आदेश माना जाता है. गुरु हरगोविंद जी ने मुगलों के अत्याचारों से पीड़ित अनुयायियों में इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास पैदा किया था. 
इस कालावधि में उन्होंने अमृतसर के निकट एक किला भी बनवाया तथा उसका नाम लौहगढ़ रखा. दिनोंदिन सिखों की मजबूत होती स्थिति को खतरा मानकर मुगल बादशाह जहांगीर ने उनको ग्वालियर के किले में कैद कर लिया था. गुरु हरगोविंद 12 वर्षों तक कैद में रहे थे. इस दौरान उनके प्रति सिखों की आस्था और अधिक मजबूत होती गई थी. वे लगातार मुगलों से लोहा लेते रहे. रिहा होने पर उन्होंने शाहजहां के खिलाफ बगावत कर दी और संग्राम में शाही फौज को हरा दिया. अंत में उन्होंने कश्मीर के पहाड़ों में शरण ली, जहां सन् 1644 ई. में कीरतपुर, पंजाब में वे अकाल पुरख में समा गये थे. अपनी मृत्यु से ठीक पहले गुरु हरगोविंद ने अपने पोते गुरु हरराय जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था. 
ग्वालियर का किला जब मुगलों के कब्जे में आया तो उन्होंने इसे जेल बना दिया था. यहां राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण और बादशाहत के लिए खतरा माने जाने वाले लोगों को कैद रखा जाता था। मुगल बादशाह जहांगीर ने यहां 52 राजाओं के साथ 6वें सिख गुरू हरगोविंद साहिब को कैद रखा था. कहा जाता है कि किसी रूहानी हुक्म से बादशाह ने आज के दिन ही गुरू हरगोविंद साहब को उनकी इच्छा के मुताबिक 52 राजाओं के साथ रिहा किया था.  इतिहास के मुताबिक मुगल बादशाह जहांगीर ने गुरु हरगोबिंद साहिब को ग्वालियर के किले में बंदी बनाया था, उन्हें लगभग दो साल तक यहां कैद में रखा.  वहां पहले से जो 52 राजा बंदी बना कर रखे गए थे जहाँगीर उन राजाओं को कुछ ऐसी दवाइयां और नशा देता था जिसकी वजह से वह आलसी और कमजोर हो जाते थे. गुरु जी के वहा जाते ही वह जगह एक मंदिर बन गयी थी. गुरु जी वहा रोज पूजा पाठ करते और सबको सुनाते जिसकी वजह से उन राजाओं का वह नशा छुटने लगा गुरु जी ने सब राजाओं से कहा की वह उन दवाइयों का सेवन ना करें. गुरु भक्ति और गुरु शक्ति से उनकी यह समस्या कुछ दिनों में ही ठीक हो गयी. 

तिहास के मुताबिक गुरू हरगोविंद को कैद किए जाने के बाद से जहांगीर को एक फकीर सांई मिंया मीर लगातार गुरू जी को आजाद करने का हुक्म देने लगा. जहांगीर इस सपने से मानसिक रूप से परेशान रहने लगा, सपना मुगल शहंशाहों के करीबी एक फकीर को सुनाया गया तो उसने भी गुरू हरगोविंद साहब को तत्काल रिहा कर देने का मशविरा दिया. गुरु जी को कैद करने पर सिखो और अन्य धर्म के लोगो ने बहुत अधिक रोष दिखाया. इसी के साथ ही सिख धर्म के लोग और गुरु जी को प्यार करने वाली संगत गवालियर के उस किले के बाहर आने लगे. सारी संगत उस किले की दीवारों को हाथ लगा कर पूरे किले की परिक्रमा करती और गुरबानी गाती. सिख धर्म के लोग आज भी गुरूद्वारे और श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी की परिक्रमा करते है. यह प्रथा इस घटना की यादगार के रूप में आज भी प्रचलित है. यह सब देखकर जहाँगीर के होश उड़ गये थे. जहागीर को लगा अब गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को कैद में रखना उचित नहीं होगा. उसने घबराकर गुरु जी की रिहाई के लिए हुकुमनामा भेजा. रिहाई का आदेश ग्वालियर पहुंचा तो गुरू अड़ गए. गुरु जी ने कहा उनके साथ उन 52 निर्दोष  राजाओं को भी रिहा किया जाएगा तभी वो बाहर निकलेंगे. राजा जहांगीर के लिए उन 52 राजाओं को रिहा करना मुगल साम्राज्य के लिए खतरनाक लग रहा था, लिहाजा उसने कूटनीतिक आदेश दिया. जहांगीर का हुक्म था कि जितने राजा गुरू हरगोविंद साहब का दामन थाम कर बाहर आ सकेंगे, वो रिहा कर दिए जाएंगे। ये उपाया इसलिए सोचा गया ताकि सिख गुरू के साथ कैद सभी राजा रिहा हो सकें. 52 कलियों का अंगरखा सिलवाया गया, गुरू जी ने उस अंगरखे को पहना और हर कली के छोर को 52 राजाओं ने थाम लिया. इस तरह सभी राजा गुरु जी का दामन पकड़ रिहा हो गए. गुरू जी के इस कारनामे की वजह से उन्हें दाता बंदी छोड़ कहा गया. उनकी इस दयानतदारी की याद बनाए रखने के लिए ग्वालियर किले पर उस स्थान पर एक गुरुद्वारा स्थापित कराया गया.
गुरू जी के इस कारनामे की याद में इस गुरुद्वारे का नाम भी गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ साहिब रखा गया. गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़’ 6 वें सिख गुरु हरगोबिंद साहिब का स्मारक है. गुरुजी की याद में 1968 में संत बाबा अमर सिंह जी ने गुरुद्वारे की स्थापना करवाई थी. करीब 100 किलो सोने का इस्तेमाल कर गुरुद्वारे का दरबार बनाया गया है.
-दीपावली की शुभ कामनाएं 





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Milan Tomic

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