गहरी
साजिश
दरअसल
इं बेदी को शुरू से ही ज्योति पर संदेह था. ज्योति के बारे में पड़ोसियों ने जो
बताया था वह भी कुछ ठीक नहीं था. पड़ोसियों के अनुसार ज्योति की अपनी सास सुरजीत
कौर से बिलकुल नहीं बनती थी. अक्सर सास-बहु के बीच झगड़ा रहता था. ज्योति का चरित्र
ठीक नहीं था, सुरजीत कौर
‘’
ज्योति मेरा टिफिन पेक हो गया.?’’
‘’ जीहाँ आपका और गुरप्रीत का टिफिन तैयार
है.’’ ज्योति ने अपने पति मंजीत सिंह का टिफिन पेक करते हुए बताया था. अपने पति और
19 वर्षीय बेटे गुरप्रीत सिंह का खाना पेक करने के बाद वह कमरे में मंजीत सिंह के
पास कोई बात करने आ गई थी.
‘’ देखिये गुस्सा न करके मेरी बात ठन्डे मन से
सुने.’’
‘’ ज्योति इस समय काम पर जाने का वक्त है.
तुम्हारी फिजूल की बातों में अक्सर मैं लेट हो जाता हूँ. तुम यह सब बातें काम से
लौटने के बाद रात को क्यों नहीं करती... अच्छा बोलो क्या बात है.?’’ मंजीत सिंह ने
पत्नी का मन रखने के लिए कहा था.
‘’ मैं यह कहना चाहती हूँ कि बीजी मेरे साथ
सौतेला व्यवहार क्यों करती है. मैं कोई नई नवेली दुल्हन नहीं हूँ, हमारी शादी को
लगभग 20-22 साल हो चुके हैं. तीन-तीन बच्चों की माँ हूँ मैं. मेरा बड़ा बेटा शादी
के लायक हो चूका है. खुद मेरी उम्र भी 36 वर्ष हो गई है. इन सब के बावजूद मुझे ऐसा
लगता है जैसे मैं इस घर की बहु नहीं मात्र एक नौकर हूँ.’’
‘’ ज्योति तुम कहना क्या चाहती हो, मेरी समझ
में नहीं आ रहा है.’’ मंजीत ने असमन्जस की हालत मे कहा.
‘’ आपको समझ नहीं आ रहा या जानबूझ कर अंजान बन
रहे है. आप अच्छी तरह से जानते हैं कि इस उम्र में भी छोटी-छोटी बातों को लेकर
बीजी मुझसे झगड़ा करती हैं. बात-बात पर टोकना तो जैसे उनकी आदत में शुमार हो. अब आप
ही बताएं मैं कोई दूध पीती बच्ची हूँ जो हर समय टीका टिप्पणी की जाती रहे. यहाँ तक
कि मेरे सारे गहने भी उन्होंने अलमारी में बंद कर रखे है. कहीं आना-जाना हो तो
पहले उनकी मिन्नतें करो या फिर बिना गहनों के ही विधवाओं की तरह कहीं जाओ. मुझे यह
सब अच्छा नहीं लगता है. बर्दाश्त की भी कोई सीमा होती है.’’
पत्नी की बातें सुनकर कुछ समय के लिए मंजीत
गंभीर तो गया था पर वह ज्योति को कोई ठोस जवाब नहीं दे सका था. वह यह भी अच्छी तरह
से जनता था कि ज्योति जो कह रही है वह सत्य तो है पर वह अपनी माँ सुरजीत कौर के
स्वभाव से अच्छी तरह वाकिफ था. वह अति पुराने विचारों की शक्की महिला थी और शायद
इसी कारण वह अपनी माँ के सामने जुबान नहीं खोल पता था. या इस तरह कहें कि वह इस
मामले को लेकर घर में क्लेश नहीं करने चाहता था. इसी लिए हर बार वह ज्योति की
बातों को टाल जाया करता था. आज भी वह ज्योति की बात को टालते हुए मंजीत ने कहा था.
‘’ ज्योति 8-30 हो गए है. मैं काम से लेट हो
रहा हूँ. हाँ तुम से वादा करता हूँ कि रात को काम से लौटने के बाद इस बारे में
बीजी से जरुर बात करूँगा. तब तक तुम सब्र रखो.’’ ज्योति को आश्वासन देकर मंजीत
सिंह अपने काम पर चला गया था.
सुरजीत कौर के परिजन
मंजीत
सिंह लुधियाना के उपनगर टिब्बा रोड की कम्पनी बाग कालोनी में रहता था. उसके पिता
की कई वर्ष पहले मौत हो चुकी थी. परिवार में 75 वर्षीय माँ सुरजीत कौर के अलावा
पत्नी ज्योति और तीन बच्चे क्रमशः 19 वर्षीय गुरप्रीत सिंह, 13 वर्षीय सिमरन कौर व
11 वर्षीय ख़ुशी थी. मंजीत सिंह लुधियाना के उद्योगिक नगर, फोकल प्वाइंट फेस-4
स्थित अग्रवाल साइकिल कम्पनी में बतौर ड्राइवर काम करता था. गुरप्रीत ने भी
मैट्रिक करने के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी और एक फैक्ट्री में काम करने लगा था. बेटियां
सिमरन और ख़ुशी अभी पढ़ रही थी. खाने-पीने या अन्य किसी चीज़ को लेकर घर में कोई कमी
नहीं थी.
दिनांक 29-5 2018 की सुबह 8-30 बजे मंजीत अपनी
पत्नी ज्योति को समझकर अपने काम पर चला गया था. कुछ देर बाद गुरप्रीत भी काम पर
चला गया और 9 बजे तक दोनों बेटियां सिमरन और ख़ुशी भी अपने स्कूल चली गई थी. सबके
चले जाने के बाद ज्योति घर के कामों में व्यस्त हो गई थी. उस समय सुरजीत कौर अपने
कमरे में लेटी हुई थी. घर का काम खत्म करने के बाद ज्योति पड़ोस में रहने वाली अपनी
सहेली बरखा के घर चली गई थी. वह सास को बताकर गई थी और यह उसका रोज का नियम था.
दोपहर के लगभग 1-30 बजे मोहल्ले वालों ने मंजीत
सिंह के घर से चीखने और जोर-जोर से रोने ली आवाजें सुनी, वह आवाज़ ज्योति की थी.
ज्योति के चीखने की आवाज सुन आसपास के लोग इकट्ठा हो गए. लोग जब आए तो उन्होंने देखा
कि सुरजीत कौर बुरी तरह से घायल थी उसके सिर से खून निकल रहा था. वह धीरे से कराह
भी रही थी. लोगों ने जब निकट जाकर देखा तो उस की सांस चल रही थी. पड़ोसियों ने इसबात
की सूचना सुरजीत कौर के बेटे मंजीत सिंह को फोन द्वारा दी और थाना टिब्बा रोड में
भी इस वारदात की इत्लाह दे दी थी. इस के बाद वह सुरजीत कौर को सिविल अस्पताल लेकर
पहुंचे. उस की गंभीर हालत को देखते हुए डाक्टरों ने वहां से सुरजीत को चंडीगढ़ स्थित
पीजीआई अस्पताल रेफर कर दिया था पर वह चंडीगढ़ पहुंचने से पहले ही रास्ते में उसकी
मौत हो गई थी.
सूचना मिलने के बाद थाना टिब्बा के इंचार्ज
इंस्पेक्टर दिलीप बेदी पुलिस पार्टी के साथ मौके पर पहुंच गए. घटनास्थल का मुआयना
करने के बाद उन्होंने घटना की सुचना एसीपी पूर्वी पवनजीत सिंह को देने के साथ
क्राईम टीम को भी मौकाए वारदात पर बुला लिया था. पुलिस ने जांच के बाद शव कब्जे
में लेकर पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दिया और इस वारदात को अपराध संख्या
15/18 पर भारतीय दंड विधान सहिंता की धारा 302-34 के तहत अज्ञात लोगों के विरुद्ध मुकदमा
दर्ज कर तफ्तीश शुरू कर दी थी.
मौका मुआयना करने पर इं दलीप बेदी को स्पष्ट
दिखाई दे रहा था कि सुरजीत की हत्या लूट के लिए की गई थी. घर का सामान इधर-उधर
बिखरा पड़ा था. अलमारी खुली हुई थी और उसमें रखे जेवर और नगदी गायब थी. यह भी साफ
पता चल रहा था कि इस वारदात को इन्जाम देने वाला जो भी व्यक्ति रहा होगा वह इस
परिवार से परिचित होगा. क्योंकि जबरदस्ती घर में घुसने के कहीं भी कोई प्रमाण नहीं
मिले थे देख कर ऐसा लगता था जैसे
हत्यारों के स्वागत के लिए पहले से ही दरवाजे
खोले गए थे या खोलकर रखे गए थे, और यह काम घर का ही कोई सदस्य कर सकता था. इसी लिए
शुरुआती पूछताछ घर के लोगों से ही की गई थी. इसके साथ ही इं बेदी ने सिपाहियों को
मोहल्ले से इस परिवार की जानकारी पता लगाने के लिए लगा दिया था.
इंस्पेक्टर दलीप बेदी
पूछताछ
के दौरान मंजीत सिंह ने वही सब बताया था जो उसदिन घटा था. कि 8-30 बजे सुबह काम पर
जाने से पहले उसकी अपनी पत्नी ज्योति से किस विषय में क्या-क्या बातें हुई थी.
मंजीत के बेटे गुरप्रीत ने बताया कि रोज़ की तरह वह उसदिन भी 8-45 बजे सुबह काम पर
जाने के लिए घर से निकल गया था. सिमरन और ख़ुशी दोनों बेटियों ने भी बताया था कि वह
किस समय स्कूल गई थी. इं दलीप बेदी ने इस बारे में पता लगाया तो पाया कि सभी लोग
सच बोल रहे थे. मंजीत और गुरप्रीत अपने काम पर थे और दोनों बच्चियां अपने स्कूल
में थी. परिवार के सदस्यों में अब केवल ज्योति बची थी. ज्योति के बारे में मोहल्ले
से जो रिपोर्ट मिली वह अच्छी नहीं थी. इस मामले में वह सस्पेक्ट मानी जा सकती थी.
लेडी हेड कांस्टेबल सुरजीत कौर को भेजकर इं बेदी ने पूछताछ के लिए ज्योति को थाने
बुलवा लिया था.
‘’ जिस समय यह घटना घटी उस समय तुम कहाँ थी.?’’
इं बेदी ने पूछा तो ज्योति ने बताया.
‘’ साहब घर का काम निपटाकर में लगभग 11 बजे
पड़ोस में रहने वाली अपनी सहेली बरखा के घर गई थी. मैं रोज़ ऐसा ही करती थी, सबको
काम और बच्चों को स्कूल भेजने के बाद घर का काम खत्म कर मैं बरखा के घर चली जाया
करती थी और वहां से मैं करीब 1 बजे लौटती थी. उसदिन भी घर का काम खत्म कर, बीजी को
दावा देने के बाद उन्हें बताकर मैं बरखा के घर चली गई थी. जिस समय मैं बरखा के घर
गई उस समय बीजी अपने कमरे में सो रही थी.’’
‘’ वारदात वाले दिन क्या हुआ था, अच्छी तरह
सोचकर विस्तार से बताओ.’’
‘’ रोज़ की तरह उसदिन भी मैं घरका काम निपटाकर
बरखा के घर चली गई थी और जब वापिस दोपहर के 1 बजे मैंने लौटकर देखा तो बीजी खून से
लथपथ अपने बिस्तर पर पड़ी थी.घर का सामान इधर-उधर बिखरा पड़ा था. यह सब देख कर मैं
घबरा गई थी मेरी समझ में नहीं आ रहा था मैं क्या करूँ. मैनें शोर मचाना शुरू किया
जिसे सुनकर पड़ोसी भागे चले आये थे.’’
‘’ जब तुम बरखा के घर गई थी तब बाहर का दरवाज़ा
बंद कर के गई थी.?’’
‘’ जी नहीं, दरवाज़ा अन्दर से बीजी ने बंद किया
था.’’ ज्योति ने स्पष्ट किया था और यहीं पर वह फंस गई थी.
दरअसल इं बेदी को शुरू से ही ज्योति पर संदेह
था. ज्योति के बारे में पड़ोसियों ने जो बताया था वह भी कुछ ठीक नहीं था. पड़ोसियों
के अनुसार ज्योति की अपनी सास सुरजीत कौर से बिलकुल नहीं बनती थी. अक्सर सास-बहु
के बीच झगड़ा रहता था. ज्योति का चरित्र ठीक नहीं था, पति के काम पर और बच्चो के स्कूल चले जाने के
बाद वह अपने प्रेमी से मिलने चली जाया करती थी. सुरजीत कौर उसे इन सब बातों के लिए
टोका करती थी.
‘’ ज्योति जी आप ने बताया कि जब आप बरखा के घर
पर थी तो पीछे से यह वारदात हो गई थी, आपने आकर यह सब देखा तो शोर मचाया तब पडोसी
आ गए थे.’’
‘’जी साहब यह सच है.’’
‘’ मैं यह पूछता हूँ कि सुरजीत कौर के साथ
लुटेरों ने इतनी मारपीट की, उन्हें घायल किया. वह भी चीखी चिलाई होंगी. तब आपने
उनकी आवाज़ कैसे नहीं सुनी थी. जब आपकी आवाज़ सुनकर पड़ोसी दौड़े चले आये थे तो सुरजीत
कौर की आवाज़ किसी ने कैसे नहीं सुनी थी.?’’
‘’ साहब इस बारे में मैं क्या कह सकती हूँ.’’
‘’ चलिए छोड़िये इस बात को. आप ने कहा था कि
बरखा के घर जाने से पहले आपने बीजी को दवा दी थी और वह अपने कमरे में सो रही
थी.’’
‘’ जी साहब.’’
‘’ तो फिर अभी आपने बताया कि दरवाज़ा बीजी ने
अन्दर से बन्द किया था. जब दवा पीने के बाद वह अपने बिस्तर पर सो रही थी तो सोते
हुए उठकर दरवाज़ा अन्दर से कैसे बंद कर सकती है.’’
हत्यारी बहु ज्योति और उसकी शेली बरखा अपने प्रेमी के साथ पुलिस हिरासत में
इं
बेदी के इस प्रश्न पर ज्योति अपनी बगलें झाँकने लगी थी, उसे भी लगने लगा था कि वह
अपने ही झूठे जवाबों के बीच उलझ कर रह गई है. फिर भी उसने अपने झूठ पर पर्दा डालने
की असफल कोशिश की थी पर कामयाब नहीं हो सकी. दरअसल ज्योति के बयानों में शुरू से
ही बड़े छेद थे. एक पड़ोसी ने साफ बताया था कि ज्योति घर से जाते समय मुख्य द्वार को
ताला लगाकर जाती थी पर उसदिन उसने ऐसा नहीं किया था. मुख्यद्वार इसलिए खुला छोड़ा
गया था कि हत्यारे आसानी से घर में प्रवेश कर सके. अपने खुद के बुने झूठ के जाल
में फंसने के बाद ज्योति ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि उसी ने सुपारी
देकर यह कांड करवाया है. ज्योति के बयानों पर इं बेदी ने उसी दिन ज्योति की सहेली बरखा,
बरखा के आशिक राजवीर कश्यप उर्फ राजू को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया था. पकड़े गए
आरोपियों की पहचान टिब्बा रोड कंपनी बाग की ज्योति, ज्योति की सहेली बरखा व बरखा
का जोकि बाबा थान सिंह चौक के निकट अम्बेदकर नगर का रहने वाला है और प्रिंटिंग का
काम करता है. बरखा ज्योति के पड़ोस में रहती है और एक बच्चे की मां है. इं बेदी ने
इस वारदात से जुड़े तीनों दोषियों को दिनांक 30 मई को अदालत में पेशकर दिनांक 1 जून
तक पुलिस रिमांड पर ले लिया था. रिमांड के दौरान इस लुट और हत्याकांड की जो कहानी
प्रकाश में आई वह कुछ इस प्रकार से थी.
घरेलू विवाद के चलते और सास की जायज़ रोकाटोकी
से परेशान होकर ज्योति ने अपनी सहेली व उसके आशिक को पैसों का लालच देकर अपनी 75
वर्षीय बुजुर्ग सास सुरजीत कौर की निर्मम हत्या करवा दी और मामले को लूटपाट की
रंगत देनी की कोशिश थी. शुरूआती जांच में यह कहानी सामने आई कि ज्योति की अपनी सास
से पटती नहीं थी. उसकी सास उसके चरित्र पर संदेह करती थी, जिसको लेकर
घरेलू विवाद रहता था. उसका पति मनजीत भी अपनी मां का साथ देता था पैसा व जेवर उसने
अपनी मां को सौंप रखे थे. यह बात भी ज्योति को बेहद खटक रही थी. घर पर पूरी तरह से
कब्जा करने और सास से छुटकारा पाने के लिए उसने यह बात अपनी सहेली बरखा को बताई, जोकि बरखा ने यह
बात अपने आशिक राजवीर राजू को बताई. जिसके बाद तीनों ने मिलकर सास को रास्ते हटाने
के लिए बड़े ही सुनियोजित ढंग से साजिश तैयार की.
साजिश के तहत राजू ने सुरजीत की हत्या करने के
बाद घर में लूटपाट करनी थी. ज्योति ने लूटे गए पैसों में 50,000 रुपए राजू को
देने का लालच दिया, जबकि
लूटपाट करने के बाद जो गहने हासिल होने थे वह ज्योति ने अपने पास रखने की शर्त रखी
थी. तीनों ने मिलकर दिनांक 29 मई दोपहर सोमवार को वारदात को अंजाम देना सुनिश्चित
किया था. मनजीत, जोकि, जहां वह
ड्राइवरी का काम करता है,
सुबह 8.30
बजे जब काम पर चला गया और उसका 19 वर्षीय बड़ा बेटा गुरप्रीत सिंह भी काम पर
निकल गया तथा दोनों बेटियां 13 साल की सिमरन व 11 साल की खुशी
स्कूल चली गई तो दोपहर करीब 1 और 1.30 बजे के बीच तीनों की फोन पर बात हुई. योजना के
मुताबिक ज्योति अपनी सास को अकेली घर में छोड़ अपनी सहेली बरखा के पास चली गई और
जाते वक्त दरवाजा खुला छोड़ गई. इस बीच वारदात को अंजाम देने के लिए राजू एक्टिवा
पर वहां आया.
घटना के वक्त सुरजीत कौर अपने कमरे में बैड पर
लेटी हुई थी. वह राजू को पहचानती थी, क्योंकि राजू की शादीशुदा बहन सुरजीत के घर के
नजदीक ही रहती थी और राजू अक्सर उसके पास आता-जाता था. घर में दाखिल होने के बाद
राजू ने योजना के मुताबिक सुरजीत से कुछ पैसों की डिमांड की, जब उसने देने से
इंकार किया तो राजू ने बड़ी क्रूरता से लोहे की छैनी से उसके सिर पर 5 से 6 बार किए. छैनी
का एक वार सुरजीत के सिर के आर-पार हो गया और वह लहुलुहान हो गई और जोर-जोर से
चिल्लाने लगी. पकड़े जाने के डर को लेकर राजू घबरा गया और खून से लथपथ छैनी मौके
पर छोड़कर वहां से भाग खड़ा हुआ. उसका मोबाईल फोन भी वहीँ रह गया था. वारदात को
अन्जाम देने के बाद उसने बाहर से किसीके फोन से ज्योति को फोन करके काम हो जाने की
सुचना दे दी थी.
इसके कुछ देर बाद ज्योति घर आ गई. सबसे पहले
उसने खून से सना सुरजीत का मोबाइल पानी से धोया और खुद को ड्रामा रचने के लिए
तैयार करते हुए लूटपाट का शोर मचा दिया. सुरजीत की एक पड़ोसन मनजीत कौर ने बताया
कि दोपहर करीब 1.50
मिनट पर उसने ज्योति के चिल्लाने की आवाज सुनी. वह जोर-जोर से चिल्ला रही थी कि
देखो उसकी सास को क्या हो गया. जब उसने ज्योति के घर आकर देखा तो सुरजीत बैड पर
पड़ी थी और उसके सिर पर चोटों के गहरे निशान थे. इसी बीच आस पड़ोस के और लोग
इकट्ठे हो गए. तब सुरजीत की सांस चल रही थी. उन्होंने कोशिश करके सुरजीत को उठाया
तो वह बैठ गई और खुद चल कर गेट तक आई, लेकिन इससे ज्यादा नहीं चल पाई. लोगों ने बताया
कि इस हालत में भी सुरजीत कौर राजू और ज्योति का नाम ले रही थी. उस समय किसी ने इस
और ध्यान नहीं दिया था. बरखा और ज्योति ने राजू को सुपारी देने के साथ यह वादा भी
किया था कि अगर वह पकड़ा गया तो उसे पुलिस से छुड़वाने और उसकी जमानत का इंतजाम भी
वे खुद कर देंगी. पूछताछ में राजू ने बताया कि ज्योति के पड़ोस में उसके रिश्तेदार
रहते हैं. उनके पास वह अकसर आता-जाता था और इस दौरान उसकी पहचान ज्योति से हुई. उसने
उसकी पहचान अपनी सहेली बरखा से करवाई. बरखा ने उसे अपनी फेसबुक आई डी दी, फेसबुक
पर बरखा से फ्रेंडशिप के बाद उसने बताया कि उसका पति उससे मारपीट करता है. बरखा के
राजू के साथ करीब दो साल से प्रेम संबंध चल रहे थे. इसी बीच ज्योति के साथ भी उसके
संबंध बन गए और तीनों साथ मिलकर एश करने लगे. बरखा की किडनी में पत्थरी थी और वह
अपने पति से तलाक लेकर राजू से शादी कराना चाहती थी. राजू ने उससे वादा किया था कि
वह उसका पथरी का इलाज करवाकर उससे शादी कर लेगा. इसके लिए उन्हें पैसों की सख्त जरूरत
थी. पर पैसों का कहीं से इंतजाम नहीं हो रहा था. इस लिए जब ज्योति ने अपनी सास के
बारे में उन्हें बताया तो बरखा और राजू इस काम को करने के लिए झटसे तैयार हो गए
थे. वैसे यह सौदा 2-50 लाख रुपयों में हुआ था. ज्योति ने भी अपने बयान में बताया
था कि वह अपनी सास से बहुत दुखी थी, पति भी उसकी नहीं सुनता था और माँ की तरफदारी
करता था. और माँ के कहने पर उससे मारपीट करता था. वह अपनी सास से दुखी होकर कई बार
घर से भी भागी थी. ज्योति चाहती थी किसी तरह से उसका सास से छुटकारा हो जाए. इसके
चलते उसने राजू को अपनी सास का मर्डर करने के लिए कहा और बदले में उसे 50 हजार
रुपए और अपने हिस्से का कुछ सोना देने की बात कही थी. इस पर तीनों ने मिल कर मर्डर
करने की प्लानिंग की और सुरजीत कौर की हत्या कर दी थी. पूछताछ के बाद देर
रात पुलिस ने आरोपी की निशानदेही पर वारदात के दौरान इस्तेमाल की गई छैनी भी बरामद
कर ली थी.
तमाम पूछताछ और पुलिस करवाई मुकम्मल होने के
बाद रिमांड की अवधि समाप्त होने पर तीनों दोषियों को अदालत में पेश किया गया जहाँ
अदालत के आदेश पर उन्हें जिला जेल भेज दिया गया था.
( पुलिस सूत्रों पर आधारित कथा का नाट्य
रुपान्तरण )
--साहिल
कपूर




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