डायन प्रथा -अंधविश्वास
का अंधेरा
हमारे समाज के इस घिनौने चेहरे और इन विषयों पर महान लेखक मुंशी प्रेम चन्द्र जी ने बहुत कहानियाँ लिखी हैं. डायन मात्र एक षड्यंत्र की उपज है.'- बिना वजह किसी लाचार वृध्दा , महिला या विधवा को ' डायन ' नहीं बनाया जाता है. प्रत्येक ' डायन ' के पीछे एक षड्यंत्र रचा जाता है. हां यह षड्यंत्र ही है,क्योंकि वास्तव में ' डायन ' का कोई अस्तित्व ही नहीं हैं. ' डायन ' भी भूत - प्रेत की तरह एक अंधविश्वास और कल्पना मात्र है. वास्तव में ओझा , सोख , जानगुरु या माझी द्वारा किसी महिला या पुरुष को ' डायन ' बताने के पीछे एक राज छिपा रहता है.
खनिज के मामले में पूरे देश में अव्वल
रहने वाला झारखंड राज्य एक और मामले में अव्वल है लेकिन यह शर्मशार करने वाला है.
महिलाओं को ' डायन '
बताकर मार डालने में भी
झारखंड टॉप पर है. देहरादून की एक गैर सरकारी संस्था के अनुसार देश में हर साल 150
से 200 महिलाओं को ' डायन '
बताकर मार डाला जाता है
गैर सरकारी संस्था के मुताबिक राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों की मानों तो इस
सूचि में झारखंड का स्थान सबसे ऊपर है. झारखंड में 50 से 60 महिलाओं की हर
वर्ष डायन कहकर हत्या कर दी जाती है. गैर सरकारी संस्था के अध्यक्ष अवधेश कौशल के अनुसार
झारखंड ही एकमात्र ऐसा राज्य नहीं है जहां महिलाओं को डायन इस तरह की क्रूरता की
जाती है बल्कि ओडीसा , छत्तीसगढ़ ,
आंध्र प्रदेश और
हरियाणा में भी डायन के नाम पर महिलाओं का उत्पीड़न किया जाता है. इस गैर सरकारी
संसथान के मुताबिक पिछले 15 वर्षों में देश में डायन के नाम पर लगभग 2500 महिलाओं की
हत्या की जा चुकी है. भारतीय विज्ञान व युक्तिवादी समिति के महा
सचिव प्रबीर घोष से जब ' डायन '
के विषय पर बात की गई तो
उन्होंने हमारे संवाददाता को बताया की डायन , भूत ,
पिचाश ,
चुड़ैल ,
डाकिनी ,
शाकिनी या फिर तंत्रमंत्र
,
झाड़फूंक आदि लोगों को
बेवकूफ बनाने का जरिया मात्र है. लोग डायन के नाम पर निजी स्वार्थ को साधने और धन
कमाने के लिए महिलाओं को जहां उत्पीड़ित करते वहीं उनकी हत्या भी करवाते हैं। जो
कि किसी भी सभ्य देश में माना नहीं जा सकता है. ऐसे लोगों के खिलाफ भारतीय दंड
विधान की धारा के तहत सख्त से सख्त कार्रवाई की आवश्यकता है.
अंगारे सी बरसती धूप की
चुभन और दर्द से बेहाल युवतियां चीखतीचिल्लाती तपते आंगन में लोटपोट हुई जा रही
थीं. धूप से बचने के लिए तमाशाई आंगन के ओसारों की छाया में सरक आए थे. जून की
दहकती दोपहर का दहला देने वाला दृश्य था. बीहड़ सरीखे सघन जंगल के बीच बने विशाल
मंदिर के बाहर लंबेचौड़े दालान में एकत्र सैकड़ों स्त्रीपुरुषों की भीड़ टकटकी
लगाए उस लोमहर्षक मंजर को देख रही थी. सुर्ख अंगारों की तरह दहकती आंखों और शराब
के नशे में धुत अघोरी जैसे लगने वाले 2 भोपे (ओझा) बेरहमी के साथ 4
युवतियों की जूतों से पिटाई कर रहे थे.
अंगारे सी बरसती धूप की
चुभन और दर्द से बेहाल युवतियां चीखतीचिल्लाती तपते आंगन में लोटपोट हुई जा रही
थीं. धूप से बचने के लिए तमाशाई आंगन के ओसारों की छाया में सरक आए थे. जिस
निर्विकार भाव से लोग इस जल्लादी जुल्म का नजारा देख रहे थे,
उस से लगता था कि यह सब उन के लिए नया
नहीं था.
लगभग एक घंटे तक अनवरत
चलने वाली इस दरिंदगी से युवतियां बुरी तरह लस्तपस्त और निढाल हो चुकी थीं. उन पर
गुर्राते और गंदी गालियों की बौछार करते भोपे उन्हें बालों से घसीटते हुए फिर से
खड़ा करने की मशक्कत में जुट गए.
नारकीय यातना का यह
सिलसिला यहीं नहीं थमा, अब उन्हें पीठ के बल रेंगतेघिसटते मंदिर
की तपती सुलगती 200 सीढि़यां तय करनी थी.
जल्लादी जुल्म ढाने वाले
आतताइयों को भी मात करने वाले इन दरिंदों की चाबुक सरीखी फटकार के आगे बेबस
युवतियों ने यह काम भी किया. तब तक उन के कपड़े तारतार हो चुके थे,
पीठ और कोहनियां छिलने के साथ बुरी तरह
लहूलुहान हो गई थीं. हांफती, कराहती, बिलखती युवतियों पर कहर अभी थमा नहीं था.
यातना का दुष्चक्र उन्हें
मारे जाने वाले जूतों के साथ आगे बढ़ता रहा. पांव उठाने तक में असमर्थ इन युवतियों
को जूते सिर पर रख कर और मुंह में दबा कर 2 किलोमीटर नंगे पांव चलते देखना तो और भी
भयावह था. और इस से भी कहीं ज्यादा दर्दनाक और दयनीय दृश्य था,
उन जूतों में भर कर पीया जाने वाला जलकुंड
का गंदा पानी.
आतंक और भय से थर्राई हुई
युवतियों को जूतों में भर कर पानी पिलाया जाने वाला पानी कैसा था,
इस की कल्पना मात्र ही विचलित करने वाली
थी. बांक्याराणी मंदिर परिसर में ही बना है हनुमान मंदिर. इस के निकट बने जलकुंड
में दिन भर में लगभग 300 से ज्यादा महिलाएं स्नान करती हैं.
समझा जा सकता है कि कुंड
का पानी कितना मैला रहा होगा. इसी गंदे पानी को युवतियों को जूतों में भर कर पीने
को बाध्य किया गया और वह भी एक बार नहीं लगातार 7 बार.
मंदिर की जिन सीढि़यों पर
महिलाओं को पीठ के बल रेंग कर उतरना होता है, वह सफेद संगमरमर की है,
जो गर्मियों में भट्ठी की तरह सुलगती हैं.
नतीजतन औरतों की पीठ न केवल छिल जाती है, बल्कि उस पर फफोले भी पड़ जाते हैं.
जुल्म की इंतहा तो तब
होती है,
जब सीढि़यां उतर चुकने के बाद भोपा उन्हें
अपने सामने ज्वाला मंदिर में बिठाता है और लहूलुहान और निढाल युवतियों पर एक बार
फिर जूते बरसाता है. पीड़ा से रोतीबिलखती युवतियों की दहला देने वाली चीखपुकार जब
वहां मौजूद उन के परिजन ही नहीं सुनते तो और कौन सुनेगा?
राजस्थान में अंधविश्वास
का यह वीभत्स और क्रूर चेहरा सिर्फ भीलवाड़ा जिले के बांक्याराणी मंदिर का ही नहीं
है,
बल्कि राजसमंद,
बांसवाड़ा और चित्तौड़गढ़ भी महिलाओं को
डायन घोषित कर के उन के कथित निवारण के नाम पर असहनीय अत्याचार के अड्डे बन गए
हैं.
अंधविश्वास की वजह से
किसी को डायन बता कर भयानक यातनाएं देना और मार डालना सिद्ध करता है कि राजस्थान
के पूर्वोत्तर समाज का एक बड़ा हिस्सा आदिम युग में जी रहा है.
इस सूबे का आदिवासी
समुदाय आज भी आधुनिकता और बर्बरता के बीच असहज अस्तित्व में फंसा हुआ है. आदिवासी
बहुल इलाकों में स्त्रियों को डायन घोषित कर उन्हें प्रताडि़त करना,
यहां तक कि मार डालना सदियों पुराना चलन
है.
प्रेत निवारण की परंपरा
का मूल स्वरूप क्या था और उस की शुरुआत कैसे हुई? यह जानने के लिए हमें राजस्थान के आदिवासी
बहुल बांसवाड़ा के गांवों में अपने दिवंगत पूर्वजों के नाम पर पत्थर गाड़ने की
परंपरा को जानना होगा, जिसे ‘चीरा’ कहा जाता है. गाजेबाजे के साथ गाड़े गए ‘चीरे’ पर लोकदेवता की तसवीर उकेरी जाती है और
विधिवत परिवार के पूर्वज का नाम अंकित किया जाता है.
ये चीरे आमतौर पर खुली
जगहों में होते हैं, लेकिन कहींकहीं टापरों में स्थापित किए
जाते हैं. चीरे मृत स्त्रियों के नाम पर भी गाड़े जाते हैं,
लेकिन बहुत कम. इन को ‘मातोर’ कह कर पूजा जाता है. ऐसे कई शिलाखंडों पर
तो साल,
नाम आदि भी खुदे होते हैं. जिस गांव में
चीरा स्थापित किया जाना होता है, उस स्थान पर गांव की कुंवारी कन्या दूध,
जल आदि से ‘बावजी’ को स्नान कराती है और कुमकुम आदि से पूजा
करती है.
संभवत: ‘बावजी’ शब्द लोक देवता के लिए इस्तेमाल किया जाता
है. गांव के बाहर निर्धारित स्थल ‘गोदरा’, जहां चीरे स्थापित किए जाने होते हैं,
उस जगह के जानकार को खत्री कहा जाता है.
खत्री चीरे के भूतवंश की पूरी जानकारी कवितामय लहजे में सुनाता है. शिलाखंडों में
कथित रूप से रह रही आत्मा के आह्वान की अलग प्रक्रिया है.
खत्री ही मृतात्माओं से
संवाद स्थापित करता है. उस समय खत्री के हावभाव और बोली असामान्य हो जाती है,
फिर शुरू होता है भविष्य कथन और कष्ट
निवारण का क्रम. मृतात्मा, जिसे खाखरिया देव माना जाता है,
खत्री उस का इन शब्दों के साथ आह्वान करता
है,
‘कूंकड़ो बोल्यो,
नेकालू साल्यो,
कालू देवती, सोनावाला ने भला,
वैसे हैं भाई कारूदेव,
जोड़ी रा हुंकार है…’
इस अवसर पर निकट बैठे
भोपों द्वारा कांसे की थाली और ढोलमजीरों से विशेष तरह का संगीत पैदा किया जाता है,
जिस की सम्मिलित ध्वनि वातावरण को अजीब
माहौल में बदल देती है. आदिवासियों की प्रचलित परंपराओं को समझें तो इन देवरों के
भोपे अपनी जानकारी के मुताबिक लोगों की समस्याओं के निवारण के लिए विशेष गणित का
सहारा लेते हैं. यही है आदिवासियों की अपने पुरखों को ‘देव स्वरूप’ में सम्मानित करने की परंपरा.
लेकिन अब ये सारी
परंपराएं नष्ट हो चुकी हैं और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों ने भोपों का रूप धारण कर
नशे के उन्माद में लूटखसोट और यौनाचार को अपना कारोबार बना लिया है. अन्यथा
आदिवासियों में चीरा प्रथा व्याधियों का उपचार करने, समस्याओं का निवारण करने और पूर्वजों की
मृत आत्माओं का आह्वान करने की है.
बावजी आदिवासियों के
लोकदेवता को कहा जाता है. कुछ अरसा पहले बांसवाड़ा के पड़ारिया गांव में तैनात एक
शिक्षक ने चीरे की परंपरा को वृक्षारोपण से जोड़ दिया था,
लेकिन यह सब तभी तक चला,
जब तक शिक्षक का दूसरी जगह स्थानांतरण
नहीं हो गया. चीरों के निकट काफी संख्या में दरख्त बन चुके फलदार पेड़ इस बात की
तसदीक करते हैं. दूसरी ओर सरकार ने यहां कुछ भी संवारने की पहल तक नहीं की.
आदिवासी जिलों में अब तक 105
स्त्रियों को डायन का बाना पहना कर
अभिशप्त घोषित किया जा चुका है, जबकि 8 महिलाओं की पीटपीट कर
हत्या की जा चुकी है. साथ ही 2
दरजन महिलाओं को मारपीट कर गांवों से
निकाला जा चुका है.
स्वस्थ महिलाओं को डायन
बनाने के ये आंकड़े पिछले 4 साल के हैं, लेकिन क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़े 4
तक भी नहीं पहुंचते. काला जादू के नाम पर
भोपे आज भी आदिवासी इलाकों में अपना सिक्का जमाए हुए हैं. आस्था यहां अकसर बदला
लेने का हथियार बन चुकी है.
प्रेतों से मुक्ति पाने
की कहानी जहां से शुरू होती है, उसे देखना ही दहशत पैदा करता है. पीडि़त
महिलाओं के परिजन ही मंदिर पहुंच कर उन्हें भोपों के हवाले कर देते हैं. भोपा
इन्हें उलटे पांवों चला कर मंदिर परिसर में ले आता है. महिला को पीठ मंदिर की तरफ
रखनी होती है तथा हथेलियों को प्रणाम की मुद्रा में रखना होता है.
महिला को सुलगती जमीन पर
नंगे पांव चलना होता है. भोपों के बारे में कहा जाता है कि निर्दयता और दुर्दांतता
में इन का कोई सानी नहीं होता. अपने जल्लादी काम में ये प्रोफेशनल की तरह पारंगत
होते हैं. इन की फीस कोई निश्चित नहीं होती, हालांकि 5 सौ से हजार रुपए में ये अपनी सेवाएं
उपलब्ध कराते हैं. इन भोपों को नकदी के साथ दारू भी देनी होती है,
अपना काम ये नशे में धुत्त हो कर ही करते
हैं. भोपों के कारोबार में मर्द और औरतें दोनों शामिल होते हैं.
बांक्याराणी मंदिर एक
ट्रस्ट के अधीन है, लेकिन इस वीभत्स कारोबार में ट्रस्ट के
अध्यक्ष की कोई भूमिका नहीं होती. अलबत्ता ट्रस्ट के अध्यक्ष नारायणलाल गुर्जर की
मजबूरी चौंकाती है. उन का कहना है, ‘भोपों की मनमानी मंदिर ट्रस्ट के लिए
मुसीबत बनी हुई है.’
नारायणलाल कहते हैं,
‘महिलाओं को इतनी दारूण
यातना देना पूरी तरह अमानवीय और शैतानी कृत्य है. ट्रस्ट पूरी तरह इस के खिलाफ है.
लेकिन फिर भी ये लोग डराधमका कर मनमानी पर उतारू हैं.’
बांक्याराणी मंदिर में
प्रेत बाधा निवरण के नाम पर स्त्रियों के भयावह उत्पीड़न की खबरें मीडिया में
सुर्खियां बनीं तो राजस्थान महिला आयोग की अध्यक्ष सुमन शर्मा बांक्याराणी मंदिर
पहुंचीं भी, लेकिन
पुलिस अधिकारियों को फटकार लगाने के अलावा वह कुछ नहीं कर सकीं. भोपों की भयावह
कारस्तानियों का खुलासा होने पर हाईकोर्ट ने संज्ञान ले कर पुलिस प्रशासन को फटकार
लगाते हुए जवाब मांगा कि बताएं कितने भोपों पर काररवाई की गई.
हाईकोर्ट की जोधपुर
खंडपीठ के न्यायाधीश गोपालकृष्ण व्यास ने इस बात पर हैरानी जताई कि महिलाओं को कोई
डायन कैसे बता सकता है? कानून होने के बाद भी इस तरह के मामले
क्यों हो रहे हैं?
विद्वान न्यायाधीश ने तो
यहां तक कहा, ‘भोपे
किसी महिला को डायन न बना पाएं और उन्हें प्रताडि़त न कर सकें,
इस के लिए जागरुकता अभियान चलाया जाए.’
लेकिन हाईकोर्ट की इस हिदायत पर अमल नहीं
हुआ.
नतीजतन भोपों के हौसले आज
भी बुलंद हैं और महिलाएं आज भी जूते मुंह में दबाए उत्पीड़न का दर्द सहने को मजबूर
हैं. घिनौनी आस्था के मल कुंड में डूबे लोगों का रूझान तब बुरी तरह चौंकाता है,
जब नवरात्रों में भोपों के दरबार में
लोगों की भीड़ का सैलाब उमड़ने लगता है.
हाईकोर्ट की सख्ती और
पुलिस की दबिश का भोपों की मनमानी पर कोई असर तो क्या होता,
इस के उलट वे और बेलगाम हो गए. अब तक
प्रदेश के आदिवासी इलाकों में ही अंधविश्वास की परत मोटी करने वाले इन भोपों को
फिल्म ‘पद्मावत’ विवाद से उफान में आए चेतन मृत्यु प्रकरण
ने शहरी इलाकों में घुसपैठ करने का अवसर दे दिया.
खबरिया चैनलों ने टीवी
स्क्रीन पर जो फुटेज दिखाए, उस का वर्णन करें तो नशे की तरंग और
उन्माद में डूबे उन्मत्त भोपे पूरे दबदबे के साथ लोगों को डरा रहे थे और सूबे पर
अंधविश्वास की काली चादर फैलाने में जुटे थे. तांत्रिकों का उत्पात और हवा में
तलवारें भांजते हुए उन का डरावना अट्टहास. बदहवास लोग खबरिया चैनलों पर चकित भाव
से देख रहे थे. इशारा साफ था कि भोपों को चेतन की घटना ने मौत का नाच दिखाने का
अवसर दे दिया था.
भोपे अपना उन्मादी चेहरा
तब दिखा रहे थे, जब
तत्कालीन पुलिस महानिदेशक अजीत सिंह यह कह कर हटे ही थे कि हम ने भोपों के गिर्द
शिकंजा सख्त कर दिया है. लेकिन कथित तांत्रिक चेतन के आत्मघात की घटना पर उन्मत्त
भोपों ने भयाक्रांत करने वाली उछलकूद मचा कर इस बात को हवा में उड़ा दिया.
सवाल है कि भीलवाड़ा जिले
के गांव निंबाहेड़ा जाटान की महिला भोपी झूमरी जीभ लपलपाते हुए कैसे तलवार चमकाने
का दुस्साहस कर रही थी? सिगरेट के धुआंधार कश लगाती हुई झूमरी
अपने आप को 9 देवियों
का अवतार बता रही थी. कांता भोपी तो निरंतर भाला घुमाते हुए अपना दरबार लगाए हुए
थी. जाहिर है कि कानून इन के ठेंगे पर था.
डायन बता कर उत्पीड़न की
ज्यादातर घटनाएं भीलवाड़ा और राजसमंद जिलों में हुई हैं. भीलवाड़ा के भोली गांव के
दबंगों की बेटी बीमार हुई तो रामकन्या को डायन घोषित कर दिया गया. लगभग एक महीने
तक दबंगों की कैद में रहने के बाद बमुश्किल छुड़ाई गई रामकन्या को 6×4
फीट की अंधेरी कोठरी में बंद कर के रखा
गया था. गांव के दबंग जाट शिवराज की 9वीं कक्षा में पढ़ने वाली बेटी पूजा बीमार
हुई तो भोपे के कहने पर नजला रामकन्या पर गिरा.
भोपे का कहना था,
‘इसे डायन खा रही है.’
भोपे की बात पर शिवराज का शक रामकन्या पर
गया,
जिस का घर
पूजा के स्कूल के पास ही था. नतीजतन
रामकन्या को डायन करार दे दिया गया.
जिस बदतर हालत में
रामकन्या को दबंगों की कैद से छुड़ाया गया, उसे देख कर डाक्टर का कहना था कि ये जिंदा
कैसे बच गई? इस
की हालत तो बहुत खराब है.
भीलवाड़ा में महिलाओं की
स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां 20
साल में डायन प्रताड़ना के 87
मामले आ चुके हैं और इन में एक दरजन से
ज्यादा महिलाओं की मौत हो चुकी है. तंत्रमंत्र की ओट में इन भोपों की व्यभिचारी
मानसिकता को समझें तो चित्तौड़गढ़ जिले के पुरोली गांव का बाबा सिराजुद्दीन
महिलाओं के शरीर से डायन निकालने के करतबी तरीकों में निर्लज्जता के साथ उन के
प्राइवेट पार्ट्स को टटोलता है.
भीलवाड़ा जिले के भुवास
गांव के भोपा देवकिशन की दरिंदगी तो देखने वालों के शरीर में सिहरन पैदा कर देती
है. यह भोपा महिलाओं की पीठ पर पूरी निर्ममता से कोड़े बरसाता है और देखने वाले
उफ्फ भी नहीं करते.
भीलवाड़ा जिले की सुहाणा
तहसील के आगरपुरा गांव की विधवा महिला रामगणी के पति और 2
बेटों की मौत के बाद उस की पुश्तैनी जमीन
हथियाने के लिए पड़ोसियों ने रामगणी समेत परिवार की सभी महिलाओं को डायन घोषित कर
दिया था.
राजसमंद जिले के रणका
गांव के दबंग परिवार में एक मौत क्या हुई, डोलीबाई को डायन बता कर उसे जगहजगह गरम
सलाखों से दागा गया. राजसमंद के थाली का तलागांव की केशीबाई को डायन बता नंगा कर
के गधे पर बिठा कर पूरे गांव में घुमाया गया. दबंगों की नजर उस की संपत्ति पर थी.
भीलवाड़ा जिले के बालवास
गांव की नंदू देवी का पूरा परिवार पिछले साढ़े 4 साल से गांव के बाहर रहने को मजबूर है.
पड़ोसी डालू का बेटा क्या बीमार हुआ, भोपे ने इस का इलजाम नंदू देवी पर डाल
दिया. इस के बाद तो पूरे गांव ने मिल कर उसे पीटा और गांव से बाहर कर दिया. नंदू
देवी गांव आने वाले हर अजनबी से पूछती है, ‘मैं डायन होती तो क्याआज मेरा पूरा परिवार
जीवित रहता?’
भीलवाड़ा की करेड़ा तहसील
के ऊदलपुरा गांव की गीता बलाई की जिंदगी उसी के परिजनों ने छीन ली. पति के
मंदबुद्धि होने के कारण घर और खेती का सारा काम गीता ही संभाल रही थी,
जो उस की जेठानी को बरदाश्त नहीं हुआ.
गीता पर डायन होने का
आरोप लगा कर जेठानी उसे घनोप माता मंदिर ले गई, जहां नवरात्रों में उसे 11
दिनों तक भूखाप्यासा रखा गया. बाद में
गीता जब कुएं से पानी निकाल रही थी तो जेठानी ने उसे धक्का दे दिया. कुएं में एक
पेड़ पर गीता का शव 10 दिनों तक लटका रहा.
चाहे भोपा हो या भोपी,
शराब के नशे में धुत्त ये डरावने चेहरे
डायन निकालने के नाम पर पूरी हैवानियत पर उतारू रहते हैं. भोपों के ठौरठिकानों को
अंधविश्वास की अदालतों का नाम दिया जाए तो गलत नहीं होगा.
अंधविश्वास की परत दर परत
दबे इन आदिवासी इलाकों में यह सवाल आज भी अनुत्तरित है कि आखिर महिलाएं ही डायन
क्यों बनती हैं? और
ऐसी कौन सी वजह होती है कि महिलाओं को सामान्य जीवनयापन करतेकरते एकाएक डायन करार
दे दिया जाता है? सूत्र बताते हैं कि डायन प्रताड़ना के
अधिकांश मामलों में संपत्ति और जमीन हड़पने के लिए उन के नातेरिश्तेदार ही ऐसी
साजिश रचते हैं. कई मामलों में लोगों ने अदावत और रंजिश के चलते महिलाओं को डायन
करार दे दिया.
अलबत्ता यह एक कड़वी
सच्चाई यह है कि डायन बनने का नजला अधिकांशत: उन्हीं महिलाओं पर गिरता है,
जो गरीब, निराश्रित या दलित वर्ग से होती हैं.
स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि आखिर क्यों इन आदिवासी इलाकों में अंधविश्वास
का अंधेरा इतना घना हो गया है कि डायन से निजात पाने के लिए आने वाली महिलाओं की
कतार नहीं थमती और न ही उन के परिजन उन्हें दहशत के तंदूर में धकेलने से बाज आते
हैं?
एक पुलिस अधिकारी का कहना
है कि कुछ मामलों में तो डायन बता कर की गई हत्याएं भूमाफिया का काम है. बेइंतहा
दर्द की ऐसी ढेरों अंतहीन कथाएं हैं, जिन में भोपों का कहर टूटा और सामान्य
जीवनयापन करने वाली औरतों को यातनाएं भुगतने के लिए छोड़ दिया गया. वरिष्ठ पत्रकार
लक्ष्मीचंद पंत कहते हैं, ‘इन घटनाओं से अगर हमारी नसें नहीं चटखीं
और दिल बेचैन नहीं हुआ तो मानवीय रिश्तों की बंदिशें कैसे बच पाएंगी?
सभार -विजय माथुर-संतोष शर्मा








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