हमारे समाज की कुरीतियाँ
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भारत पाक सीमा के साथ सटे कस्बा खेमकरण में प्रेम संबंधों के चलते दोहरे हत्याकांड को अंजाम दिया गया। लड़के के परिजनों ने पुलिस को शिकायत दी तो मामले का खुलासा हुआ। जांच के बाद जस्सा सिंह, उसके भाई शेर सिंह, हरपाल सिंह, उसकी पत्नी मनजीत कौर, मनप्रीत कौर पत्नी हरपाल सिंह, गुल्ला सिंह पुत्र बोहड़ सिंह, राणा पुत्र शेर सिंह और आकाश पुत्र जस्सा सिंह पर हत्या का केस दर्ज कर सभी अभियुक्तों को जेल भेजा गया.
 लाइब्रेरी में हसनप्रीत सिंह अपने सामने अखबार फैलाए बैठा था, मगर उसका सारा ध्यान सीढ़ियों की तरफ ही लगा हुआ था. सीढ़ियों पर जैसे ही किसी के आने की आहट होती, वह चौकन्ना होकर उधर देखने लगता. उसे पूरी उम्मीद थी, कि रमनदीप कौर जरूर आएगी. दरअसल वह खुद ही तयशुदा वक्त से पंद्रह-बीस मिनट पहले आ गया था. 
यूँ इस कस्बे में उन दोनों की मुलाकातें न के बराबर ही हो पाती थीं. सारा दिन एक-दूसरे के लिए तड़पते रहने के बावजूद, वे दस-पंद्रह दिनों में एकाध बार, बस तीन-चार मिनट के लिए ही मिल पाते थे. इस छोटी-सी मुलाकात के दौरान भी आमतौर पर उनमें आपस में कोई बात न हो पाती. उनकी बातचीत का माध्यम वे स्लिपें ही रह गई थीं, जो एक-दूसरे को लिखा करते थे. इन्हीं स्लिपों में वे अपनी सब भावनाएँ, अपने सब दर्द उड़ेल दिया करते थे. इन्हीं स्लिपों से तय होती थी, उनकी अगली मुलाकात की जगह और उसका वक्त. 
दरअसल खेमकरण जैसे छोटे से इस कस्बे में लड़के-लड़की का आपस में बात करना इतना आसान नहीं था. फिर बात जब एक ही गाँव और एक ही बिरादरी की हो तो और भी मुश्किलें पैदा हो जाती हैं. बात तो कहीं न कहीं की जा सकती थी, पर बात करने की खबर जंगल की आग की तरह पूरे कस्बे में फैलते देर नहीं लगती थी. कम उम्र के होने के बावजूद लड़के-लड़की में इतनी समझ थी, कि वे न तो अपनी और न अपने घर वालों की बदनामी होने देना चाहते थे. इसलिए जब भी वे आपस में मिलते तो यही कोशिश करते, कि बात न की जाए. हाँ, कभी-कभार मौका मिल जाने पर एकाध वाक्य का आदान-प्रदान हो जाया करता था. बावजूद इतनी सावधानी के आखिर एक दिन उनकी चोरी पकड़ी गई थी और उस दिन दोनों के घर में जो तूफान उठा था वह बड़ा भयानक था. दरअसल उनके महौल्ले के किसी आदमी ने दोनों को एक साथ देखकर उनके घर शिकायत कर दी थी. 

सन प्रीत सिंह के पिता परविंदर सिंह भारत-पाक सीमा पर बसे क़स्बा खेमकरण सेक्टर के वार्ड-2 के मूल निवासी थे. परविंदर सिंह के दो पुत्र है. बड़ा बेटा अर्शदीप सिंह जो शादीशुदा है और छोटा बेटा 21 वर्षीय हसन प्रीत है जो अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने पिता के साथ खेतीबाड़ी करता है. जाट परिवार से सम्बंधित परविंदर सिंह के पास कई एकड़ उपजाऊ भूमि है और उनकी गिनती बड़े किसानों के तौर पर की जाती है. धन-दौलत एश्र्व्य, किसी चीज की उनके पास कमी नहीं है.
वहीँ रमनदीप कौर के पिता जस्सा सिंह की गिनती भी बड़े किसानों में गिनी जाती है उनके पास भी कई एकड़ उपजाऊ भूमि और सुख सुविधाओं का सारा सामान है. जस्सा सिंह का परिवार भी परविंदर के घर के कुछ दूरी पर वार्ड नम्बर-2 में ही रहता है. दोनों परिवारों में अच्छा मेल मिलाप था पर वर्चस्व को लेकर कभी कभार दोनों परिवारों के बीच कहा सुनी हो जाती थी.  
हसन अखबार सामने रखे अपने आसपास बैठे लोगों पर भी नजर रखे था. यह ध्यान रखना बेहद जरूरी था, कि उन लोगों में से उसकी जान-पहचान का कोई न हो. साथ ही इस बात का ख्याल रखना भी जरूरी था, कि वहाँ बैठे किसी आदमी को उस पर यह शक न हो जाए कि वह वहाँ अखबार पढ़ने के लिए नहीं बल्कि किसी और इरादे से आया है. एक समस्या और भी थी. सामने के, किताबों से भरी अलमारियों वाले, कमरे में लाइब्रेरियन के अलावा कई लोग मौजूद होते थे, उस कमरे में लोगों का आना-जाना भी लगा रहता था. हसन और रमनदीप की मुलाकात करीब दो साल पहले एक शादी समारोह में हुई थी. प्लस 2 तक पढ़ाई पूरी करने के बाद हसन एग्रीकल्चर का डिप्लोमा कर  अपने पिता के साथ अपने खेतों में आधुनिक तरीके से खेती का काम करने लगा था.
रमनदीप कौर दरमियाने कद की,गोरी सी साधारण सी लड़की थी और यही साधारणता ही उसके आकर्षण का कारण थी जिस पर हसन प्रीत पूरी तरह कुरबान था.
                                                        तफ्तीश करते पुलिस अधिकारी 
हर में दो लाइब्रेरियाँ थी एक तो बहुत छोटी थी जिसमे मात्र 4-6 लोग बड़ी मुश्किल से बैठ पाते थे. वहां मिलने का तो सवाल ही नहीं उठता था, हाँ यह दूसरी लायब्रेरी काफी बड़ी थी. वे लोग इसी लायब्रेरी में ही मिला करते थे. अब दोनों कोड शब्दों के जरिए मिलने की जगह, तारीख और समय तय कर लेते और इस तरह दस-पंद्रह दिनों में एक बार मिला करते. इन्हीं मुलाकातों में वे भावनाओं से लबालब अपनी-अपनी स्लिपें, किसी न किसी तरीके से एक-दूसरे को पकड़ा दिया करते थे. आज का मिलना भी इसी तरह एक चिट्टी के जरिए ही तय हुआ था,  हसन प्रीत की नजरें बार-बार अपनी कलाई घड़ी से टकराती. तयशुदा वक्त से पूरे सात मिनट ऊपर हो चुके थे. वह मायूस हो चुका था, कि अब रमन  नहीं आएगी. तभी हाथ में एक छोटा-सा लिफाफा पकड़े रमन  सीढ़ियों से प्रकट हुई. बैंच पर संयोगवश लड़के के पास वाली जगह खाली थी, जहाँ आकर रमन  बैठ गई. आसपास इतने लोग बैठे थे कि बात करना बिलकुल असंभव लग रहा था. हसन के दिल में तूफान-सा मच रहा था. लाइब्रेरी में जमे तल्लीनता से अखबार पढ़ रहे लोगों के बीच पसरी चुप्पी के होते, यह कतई संभव नहीं लग रहा था. हसन ने कनखियों से रमन की ओर देखा. वह भी अखबार सामने रखे हुए उसे पढ़ने का नाटक कर रही थी. 
इसी उधेड़बुन में कई मिनट बीत गए. हसन बड़ी बेचैनी-सी महसूस कर रहा था. इससे पहले ऐसे कई मौके आए थे, जब वे इस तरह लाइब्रेरी में मिले थे और आपस में उनकी कोई बात नहीं हो पाई थी, पर आज का दिन तो विशेष था. रमन ने कोई विशेष बात करने के लिए हसन को बुलाया था. अंत में अपने चारों ओर देखने के बाद रमन ने चौकन्ने होकर धीमें स्वर में कहा.
‘’हसन. मेरे पिता जी किसी भी सूरत में हमारी शादी के लिए तैयार नहीं होंगे, इसलिए तुम मुझे भूल जाओ.’’
‘’ अपने प्यार को भूलना क्या इतना आसान होता है.? तुम भी पागलों जैसी बातें करती हो.’’ हसन ने रूआसे होकर कहा. ‘’ देखो मेरे पिता को देखो, वह मेरी ख़ुशी की खातिर तुम्हें अपनी बहु बनाने को तैयार हो गए हैं क्या तुम्हारे पिता जी मुझे अपना दामाद स्वीकार नहीं कर सकते है,?’’
‘’ यही तो विडंबना है मेरे भाग्य के साथ. तुम्हारी जुदाई शायद मेरा नसीब है.’’
‘’ तुम भी बेकार की बातें करती हो, इन्सान को अपनी कोशिश तब तक जारी रखनी चाहिए जब तक उसकी समस्या का समाधान नहीं हो जाता.’’ हसन ने रमन को हौंसला बंधाते हुए कहा.
‘’तुम पुरुष हो और तुम्हारे लिए ऐसी बातें करना सहज है लेकिन मैं अबला हूँ और इस समाज का और अपने परिवार का सामना नहीं कर सकती.’’ रमन के यह वाक्य उसके टूटे ह्रदय की वेदना और उसकी हार की निशानी थे जिसे हसन ने स्पष्ट महसूस किया था इसलिए सांत्वना बंधाते हुए उसने कहा.
‘’ एक काम करो. तुम सारी बाते उस वाहे गुरु पर छोड़ दो. अगर हमारा प्यार सच्चा है और इरादा पक्का है तो मुझे पूरा विश्वास है सच्चे पातशाह हमारी सहायता जरूर करें गे और कोई न कोई रास्ता अवश्य निकालें गे, बस तुम उन पर विश्वास रखना.’’ एक दूसरे से इतना कहकर वे दोनों अपने-अपने रास्ते चले गए.
जस्सा सिंह और उसके भाइयों को जिस दिन से यह खबर लगी थी कि परविंदर का छोटा बेटा हसन उनकी बेटी रमन में दिलचस्पी ले रहा है तो उस दिन से उन्हों ने रमन पर नज़र रखना शूरू कर दिया था. यहाँ तक कि किसी काम से अपने घर के सामने रहने वाले अपने चाचा के घर भी अकेले जाने की उसे इजाज़त नहीं थी ऐसे में हसन से मिलना तो बिलकुल संभव नहीं था इसी लिए अपनी आखरी मुलाकात में वह हसन को स्पष्ट कह आई थी कि शायद अब दोबारा मिलना कभी सम्भव न हो. हसन के कहने पर उसने अपने जीवन की बागडोर वाहेगुरु के हाथ में सौंप दी थी और आने वाले समय का बड़ी बेसब्री से इंतजार करने लगी थी. हसन ने भी अपने आपको वाहेगुरु की मर्जी के हवाले कर दिया था अब उन की मुलाकातें लगभग समाप्त हो गई थी. पर जस्सा सिंह और उनके परिवार के दिमाग में यह फितूर अभी तक बना हुआ था. उन्हें हर समय यह संदेह घेरे रहता था कि हसन अब भी उनकी लड़की से मिलता जुलता है. वह किसी न किसी बहाने से हसन और उसके परिवार को सबक सिखाने के लिए उतावले रहते थे.
दिनांक 13 मई 2018 की बात है. शाम के लगभग 4 बजे का समय होगा. परविंदर ने अपने बेटे हसन से कहा कि वह हवेली में जाकर पशुओं को चारा डाल आये. परविंदर के पास कई दुधारू पशु थे अत; उसने पशुओं के लिए अपने घर के बाहर एक हवेली बना रखी थी. वह हवेली जस्सा सिंह के घर की तरफ थी और पशुओं को प्रतिदिन चारा डालने की जिमेदारी हसन की थी. सो दिनांक 13 तारीख रविवार की शाम 4 बजे भी वह रोज की तरह पशुओं को चारा डालने हवेली गया था. हवेली में पशुओं को चारा डालकर हसन लगभग 2 घंटे में लौट आता था पर उसदिन देर रात गये जब वह वापिस नहीं लौटा तो परविंदर को उसकी चिता हुई. उन्होंने अपने बड़े बेटे अर्शदीप के साथ जाकर हवेली में देखा तो हैरान रह गए. पशु चारे बिना भूख से बिलबिला रहे थे.
तो इसका मतलब हसन हवेली आया ही नहीं.? परविंदर ने अपने आप से सवाल किया. मन ही मन कुढ़ते हुए उन्होंने अर्शदीप से कहा.
‘’ बड़ा लापरवाह लड़का है, भूखे पशुओं को छोडकर न जाने कहाँ आवारागर्दी कर रहा है. आज इसकी खबर लेनी पड़ेगी. इसके बाद दोनों बाप बेटे ने मिलकर पशुओं को चारा खिलाया और उसके बाद हसन की तलाश शुरू कर दी, परविंदर के भाइयों को भी इस बात का पता चला वह भी हसन की तलाश में जुट गए थे. सब को इस बात का आश्चर्य था कि आज से पहले हसन ने इस प्रकार की हरकत कभी नहीं की थी फिर आज ऐसा किया हुआ जो वह बिना कुछ बताए घर से लापता हो गया था. बहरहाल रात भर हसन की तलाश की जाती रही पर उसकी कहीं खोज खबर नहीं मिली थी.
                                                                    /                                 
अगले दिन सुबह परविंदर सिंह को उनकी रिश्तेदारी में लगते भाई दया सिंह ने आकर बताया कि उसके लड़के हसन को जस्सा सिंह का परिवार पकड़कर अपने घर ले गया है. उसे यह खबर किसी ने बताई थी. बताने वाले ने बताया था कि जिस समय हसन पशुओं को चारा डालने हवेली जा रहा था तो उसने देखा जस्सा सिंह और उसके भाई हसन को अपने साथ अपने घर की ओर ले जा रहे थे. यह बात पता चलते ही परविंदर उसका बेटा अर्शदीप और उनके रिश्तेदार जस्सा सिंह के घर पहुंचे पर जस्सा सिंह ने हसन के वहां होने से साफ़ इंकार कर दिया और परविंदर  व अन्य सभी लोगों की बेज्जती कर अपने घर से भगा दिया.
स्सा सिंह के ऐसे व्यवहार से परविंदर सिंह का शक विश्वास में बदल गया और किसी अनहोनी के अहसास से उनका ह्रदय बुरी तरह कांप उठा. वह वही से सभी लोगो के साथ थाना खेमकरण पहुंचे और थाना प्रभारी बलविंदर सिंह को हसन प्रीत के लापता होने की पूरी घटना सुनते हुए संदेह जस्सा सिंह और उसके परिवार पर जताया. थाना प्रभारी बलविंदर सिंह ने परविंदर की पूरी शिकायत सुनने के बाद उनके लिखित बयान दर्ज किये और ए एस आई चरणसिंह, दर्शन सिंह. हे का दिलबाग सिंह, बलविंदर सिंह, इंदरजीत सिंह, मेजर सिंह, त्रलोक सिंह और दलविंदर सिंह को साथ लेकर जस्सा सिंह के घर पहुंचे. थाना प्रभारी बलविंदर सिंह के हसन के विषय में पूछने पर जस्सा सिंह ने बताया कि उन्होंने तो कई दिनों से हसन को नहीं देखा. इसके बाद थाना प्रभारी बलविंदर सिंह ने रमनदीप कौर के विषय में पूचा तो जस्सा सिंह ने बताया, वह रिश्तेदारी में गई हुई है. कहाँ गई है यह पूछने पर वह बगलें झाँकने लगा. थाना प्रभारी बलविंदर सिंह का संदेह गहराता चला गया, उनहोंने परिवार के हर सदस्य से जब अलग-अलग पूछताछ की तो सब के बयान एक दूसरे के विपरीत थे. थाना प्रभारी बलविंदर सिंह ने अब वहां ठहरना उचित नहीं समझा और पूछताछ के लिए सब को हिरासत में लेकर थाने आ गये. थाने पहुंच कर जब सबसे सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि उन सब ने मिलकर हसन प्रीत और रमनदीप कौर की हत्या कर उनकी लाशों को छुपा दिया है. इस अपराध स्वीकृति के बाद थाना प्रभारी बलविंदर सिंह ने एसएसपी तरनतारन दर्शन सिंह मान को इस हत्याकांड की सूचना दे दी थी और उनके निर्देश पर  जस्सा सिंह पुत्र काबल सिंह, उसके भाई हरपाल सिंह, शेर सिंह उनकी पत्नियाँ मंजीत कौर पत्नी जस्सा सिंह, मनप्रीत कौर पत्नी हरपाल सिंह और उनके बेटे राणा पुत्र शेर सिंह, आकाश पुत्र जस्सा सिंह और एक रिश्तेदार धुला सिंह को हिरासत में लेकर इस अपराध को अपराध संख्या -28 पर भरतीय अपराध सहिंता की धारा- 302- 364 201- 148- 149 के तहत मुकदमा दर्ज कर सबको हसन प्रीत सिंह और रमनदीप कौर की हत्या के अपराध में सक्षम अदालत में पेश कर दो दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया था.
पूछताछ के दौरान अभियुक्तों ने बताया कि दोनों की हत्या करने के बाद रमनदीप कौर का शव जस्सा सिंह के घर के सामने रहते उसके भाई हरपाल सिंह के घर में बने शौचालय के मेन होल में छिपाया गया है और हसन की लाश को उन्होंने जस्सा सिंह के घर में बने शौचालय के मेन होल में छुपाया था. थाना प्रभारी बलविंदर सिंह ने अभियुक्तों की निशानदेही पर एसएसपी दर्शन सिंह मान और पट्टी के एसडीएम सुरिंदर सिंह की मौजूदगी में दोनों घरों से हसन और रमनदीप की लाशें बरामद कर के उन्हें पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेजवा दिया था.
सभी अभियुक्तों से पूछताछ के बाद इस दिलदहला देने वाले हत्याकांड की जो कहानी प्रकाश में आई वह हमारे समाज में बनाई गई सदियों पुरानी दो प्रेमियों को आपस में जुदा करने की परम्परा पर आधारित क्रूरता की दास्ताँ है.
सन प्रीत सिंह और रमनदीप कौर दोनों आपस में बेहद प्रेम करते थे और आपस में शादी करना चाहते थे जो कि जस्सा सिंह को किसी भी कीमत पर गंवारा नहीं था. उसने अपनी बेटी पर पहरे बिठा दिए. उसका घर से बाहर तक निकलना बंद करवा दिया था. पर इं सब के बावजूद उसके मन में यह बात कहीं घर कर बैठी हुई थी कि एक ना एक दिन हसन उसकी बेटी को भगा ले जाएगा या उसकी बेटी उसे धोखा देकर हसन के साथ भाग कर शादी कर लेगी. इसी बात को हर समय ध्यान में रखकर उसे यह बहम हो गया था. उसे अपनी मूछ पर बड़ा गर्व था वह नहीं चाहता था कि बेटी को लेकर कल उसे अपनी मूछें नीची करनी पड़ें, इसलिए वह इस किस्से को ही जड़ से खत्म करना चाहता था. उसका सोचना था ना रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी. इसलिय वह मौके की तलाश में रहने लगा. हसन की हत्या की योजना अपने भाइयों के साथ मिलकर वह बहुत पहले ही बना चूका था सो 13 मई की शाम जब हसन अपने पशुओं को चारा डालने हवेली की ओर जा रहा था तो जस्सा सिंह और उसके भाई हरपाल ने उसे रास्ते में ही रोक लिया और कोई बात करने का बहाना बनाकर अपने घर ले गए. उनके घर पहुंचने पर घर की औरतों मंजीत कौर और मनप्रीत कौर ने घर का मुख्य दुवार बंद कर दिया और हसन से बिना कोई बात किये और बिना कोई अवसर दिए अपने ट्रैक्टर की लोहे की मोटी रेड उठाकर उसके सिर में दे मारी. अचानक हुए इस हमले से हसन चक्करा कर जमीन पर जा गिरा था. रमनदीप कौर अपने कमरे से यह सब नजारा देख रही थी. अपने प्रेमी की यह हालत देख वह उसका बचाव करने भागती हुई जब आई तो जस्सा सिंह ने उसी राड का एक जोरदार वार उसके सर पर भी कर दिया था और चीखते हुए कहा .
‘’ अपने यार को बचाने आई है, अब तूँ भी मर.’’
इसके बाद सब ने मिलके हसन और रमन पर अनेकों वार तब तक किये जब तक उन के प्राण नहीं निकल गए थे. हत्याओं को अंजाम देने के बाद रमनदीप कौर का शव जस्सा सिंह के घर के सामने रहते उसके भाई हरपाल सिंह के घर में बने शौचालय के मेन होल में छिपाया गया और हसन की लाश को जस्सा सिंह के घर में बने शौचालय के मेन होल में छुपाया था.
पुलिस रिमांड कै दौरान अभियुक्तों की निशानदेही पर वह लोहे की राड भी बरामद कर ली गई थी जिससे दोनों प्रेमियों की हत्या की गई थी. तमाम पुलिस करवाई पोरी कर और रिमांड की अवधि समाप्त होने के बाद इस हत्याकांड से जुड़े सभी आठों अभियुक्तों को अदालत में पेश कर जिला जेल भेज दिया गया था.
(पुलिस सूत्रों पर आधारित कथा का नाट्य रूपान्तरण)   
--हरमिंदर कपूर


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Milan Tomic

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