--सिरफिरा आशिक--
एक महीने तक लगातार प्रयास करने पर भी पुलिस और लल्लू के परिजनों को
उसकी लाश नहीं मिली थी. खेल-खेल में लल्लू की गुमशुदगी से शुरू हुआ यह ड्रामा अंत
में इतने भयानक अंजाम तक पहुंचेगा इस बात की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी.
नफरत का शिकार लल्लू उर्फ़ वीरेंदर कुमार
आखिर काफी हताश होने के बाद कन्नू लाल
ने यह तय किया कि अब अपने बेटे लल्लू की तलाश करने में वे और समय बर्बाद नहीं
करेंगे और समय रहते ही पुलिस की सहायता लेंगे, उनके लिए यही ठीक रहेगा. यही बात
उन्होंने अपनी पत्नी और रिश्तेदारों को भी बताई और उसी शाम वह अपने पड़ोसी भानु को
साथ लेकर लुधियाना के थाना डिविजन नम्बर -2 अंतर्गत आने वाली पुलिस चौकी जनकपुरी
जा पहुंचे थे.
कन्नू लाल मूल रूप से मकान नं- 18,
गाँव मछली, पोस्ट बेहपुर रामनाथ, जिला गोंडा-उत्तर प्रदेश के निवासी थे. आजसे कई
वर्ष पहले कन्नू लाल काम की तलाश में अपने किसी रिश्तेदार के साथ गाँव से लुधियाना
आये थे और काम लग जाने के बाद यहीं के होकर रह गए थे. काम जम जाने के बाद कन्नू
लाल गाँव से अपनी पत्नी कंचन और बच्चों को भी लुधियाना लिवा लाये थे और इंडस्ट्रीज
एरिया में लक्ष्मी धर्म कांटे के निकट अजीत अरोड़ा के बेह्ड़े में कमरा लेकर रहने
लगे थे. कन्नू लाल की चार संताने थी. दो बेटे और दो बेटियां. बड़ी बेटी कुसम 20 साल
की थी और शादी के लायक थी. इसके बावजूद वह कक्षा- 7वीं की छात्रा थी. कन्नू लाल का
सबसे छोटा बेटा वरिंदर उर्फ़ लल्लू 11 साल का था और कक्षा-4 में पढ़ता था. दिनांक
27-7-2017 को लल्लू दोपहर को अपने स्कूल लौटा और खाना आदि खाने के बाद गली में
बच्चों के साथ खेलने लगा था. यह उसका रोज का नियम था. कन्नू की पत्नी कंचन और बाकी
बच्चे घर में सो रहे थे. शाम करीब 4 बजे कंचन ने चाय बनाई और लल्लू को आवाज़ देकर
बुलाया. लेकिन लल्लू गली में नहीं था. कंचन ने गली में खेल रहे दूसरे बच्चों से
पूछा तो सभी बच्चों ने यही बताया कि लल्लू तो अभी यहीं उनके साथ खेल रहा था. चाय
पीनी छोड़कर सभी लल्लू की तलाश में जुट गए थे. लल्लू हमेशा अपने घर के आगे ही खेलता
था. वह दूर कहीं नहीं जाया करता था. बहरहाल शाम को लल्लू के पापा कन्नू लाल काम से
लौटकर जब घर पहुंचे तो वह भी लल्लू की तलाश में जुट गए थे. पूरी रात तलाशने के बाद
भी लल्लू का कहीं पता नहीं चला था. सब हैरान थे कि आखिर एक 11 साल का बच्चा कहाँ
जा सकता है. इसके पहले आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ था.अगला दिन भी लल्लू की तलाश में
गुज़रा था. शाम को कन्नू लाल ने लल्लू की गुमशुदगी पुलिस चौकी में दर्ज करवा दी थी.
ड्यूटी अफसर हवलदार भूपिंदर सिंह ने कन्नू की गुमशुदगी अपराध संख्या – 125 पर धारा
346 के तहत दर्ज कर यह सूचना अपने आला अधिकारीयों को भी दे दी थी. और लल्लू का
हुलिया व उसका फोटो आसपास के सभी थानों में रिलीज़ कर दिया था.
लल्लू की तलाश में पुलिस ने कोई कसर
छोड़ी थी और ना उसके माता- पिता रिश्तेदारों ने. पर लल्लू का कहीं भी कोई सुराग
नहीं मिल रहा था. कन्नू लाल कोई धन्ना सेठ तो था नहीं, एक गरीब मजदूर था जो दिनरात
मेहनत कर अपने बच्चों का पालन पोषण कर रहा था. इसलिए फिरौती का एंगल तो बनता नहीं
था. बाकी रही दुश्मनी की बात तो ऐसा सोचा जा सकता था कि दुश्मनी के चक्कर में किसी
ने लल्लू को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की हो.? इसी लिए पुलिस बार-बार कन्नू से यह
पूछ रही थी कि उसकी किसीसे कोई लड़ाई झगड़ा या दुश्मनी आदि तो नहीं थी.लल्लू को गुम
हुए एक सप्ताह गुज़र चूका था पर कहीं से भी उसका कोई सुराग पुलिस या उसके माता पिता
के हाथ अबतक नहीं लगा था.
घटना के 9 दिन बाद अचानक कन्नू लाल के
मोबाईल फोन पर एक शख्स का फ़ोन आता है. फोन कर्ता का कहना था कि लल्लू उसके कब्जे
में है. अगर लल्लू जिन्दा और सही सलामत चाहिए तो 2 लाख रूपया बैंक अकाउंट नम्बर-
0000 में डलवा दो. लल्लू मिल जायेगा.
लल्लू की माँ-बहन और परिजन
कन्नू लाल ने तुरंत इस बात की सूचना
पुलिस को दी. अब मामला केवल लल्लू की गुमशुदगी का नहीं रह गया था. लल्लू का अपहरण
फिरौती के लिए किया गया था सो पुलिस हरकत में आ गई थी. और ए.डी.सी.पी. वन गुरप्रीत
सिंह की सुपरविजन में एक टीम का गठन किया गया जिसका इंचार्ज एसीपी वरियाम सिंह को
बनाया गया था. पुलिस ने पहले दर्ज मामले में धारा- 384 भी जोड़ दी
थी. हत्या के 9 दिन बाद 4 अगस्त को
लल्लू के पिता कुन्ने लाल के मोबाइल पर फोन कर 2 लाख रुपए
फिरौती मांगकर फोनकर्ता ने नम्बर स्विच ऑफ कर दिया था. जांच आगे बढ़ाते हुए कन्नू
लाल के फोन की डिटेल निकलवाई गई और उसके फोन को सर्विलांस पर लगाया गया था. काल
डिटेल से पता चला कि कन्नू लाल को लोकल अड्डे से फोन किया गया था. तुरंत एक टीम
वहां भेजी गई शायद कोई संदिग्ध मिल जाए. क्यों की लोकल अड्डा क्षेत्र काफी बड़ा और भीड़
भाड़ वाला इलाका है, पास में ही रेलवे स्टेशन है. पर पुलिस को वहां से कुछ नहीं
मिला था. पुलिस यह मानकर चल रही थी कि लल्लू का अपहरणकर्ता जो भी रहा हो गा, वह
कन्नू लाल का कोई नजदीकी, या फिर रिश्तेदार रहा होगा. क्योंकि अपह्र्नकर्ता ने जो
दो लाख रुपये की फिरौती मांगी थी, वह कन्नू लाल की हैसियत देखकर ही मांगी थी. भले
ही वह गरीब था. पर अपने बच्चे के लिए वह दो लाख का इंतजाम कर सकता था. भले ही वह
गाँव की जमीन बेचकर इंतजाम करे. वह जो भी था कन्नू लाल के परिवार को गाँव तक जनता
था. सो इसबार पुलिस ने कन्नू लाल और उसके परिवार के हर छोटे बड़े सदस्य से पूछताछ
की. कुछ खबर पड़ोसियों से भी ली और मुखबिरों को भी काम पर लगाया. तब कहीं जाकर अंदर
की बात पता चली थी. पुलिस को अब लगने लगा था कि अब वह जल्द ही अपहरणकर्ताओं तक
पहुँच कर लल्लू को सकुशल चुदा सकती है. पर अभी दिल्ली बहुत दूर थी.
कन्नू लाल के परिवार से पता चला कि
कुछ दिन पहले उनका अजमल आलम नामक व्यक्ति के साथ झगड़ा हुआ था. 30 वर्षीय अजमल आलम
उनके ही पड़ोस में रहता था और कपड़े की कढ़ाई का बहुत अच्छा कारीगर था. उसकी कमाई भी
अधिक थी और उसका कन्नू के घर काफी आना जाना था. वह उसके परिवार के काफी निकट था और
सभी बच्चों से ज्यादा घुला मिला हुआ था. खासकर कन्नू की बड़ी बेटी कुसम से. आजसे 7
वर्ष पूर्व अजमल आलम की उम्र करीब 22-23 वर्ष रही होगी और कुसम लगभग 14 साल की थी.
अजमल मूल रूप से गाँव भयंकर दोबारी, जिला किशनगंज- बिहार का निवासी था. उसने अपने
आपको अविवाहित बताकर कुसम को अपने प्रेमजाल में फांस लिया था. इसके दो वर्ष बाद
उसने कुसम को उससे शादी करने का झांसा देकर शारीरिक सम्बन्ध बना लिए थे और यह
सिलसिला अब तक चलता रहा था. यूं कहा जाये तो ज्यादा उचित रहेगा कि 7 वर्ष तक उसने
कुसम का इस्तेमाल अपनी पत्नी की तरह से किया था. अजमल से कुसम के सम्बन्ध हैं और
कितने गहरे हैं, यह बात कन्नू और उसकी पत्नी कंचन को भी थी. उनकी नज़रों में अजमल
अविवाहित था. अच्छा कमाता था. वह कुसम से भी बहुत प्यार करता था और शादी करना
चाहता था. ऐसे में कन्नू लाल और उसकी पत्नी कंचन को भला क्या एतराज़ हो सकता था. उन्होंने
भी जैसा चल रहा था, वैसा चलने दिया था. ना कभी बेटी पर कोई अंकुश लगाया और ना ही
अजमल को अपने घर आने से रोका था. यह बात जून 2018 की है कि अचानक किसी के माध्यम
से कंचन और कुसम को पता चलता है कि जिस अजमल को वह अपना दामाद बनाने का सपना देख
रही थी वह तो पहले से ही शादीशुदा और दो बच्चों का बाप है. इतनी बड़ी बात छुपाकर वह
उनकी बेटी के साथ लगातार 7 सालों तक दुष्कर्म कर अपना मुंह कला करता रहा था. तो यह
सोचकर माँ-बेटी के होश उड़ गए थे. उस समय अजमल अपने कमरे पर ही था. कुसम और कंचन ने
जाकर उसके साथ झगड़ा कर उसकी खूब पिटाई की और यह बात मोहल्ले की पंचायत तक भी
पहुंची थी. पंचायत के कहने पर कंचन ने अजमल को धक्के मारकर मोहल्ले से बाहर निकल
दिया था. अजमल ने भी चुपचाप वहां से चले जाने में अपनी भलाई समझी थी. क्योंकि
मोहल्लेवालों वालों के सामने हुई जबरदस्त बेज्जती के बाद वह वहां नहीं रह सकता था.
इसलिए वह अपना सामान लिए बिना ही उस मोहल्ले को अलविदा कह गया था.
दोषी अजमल और उसे गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम
यह सारी कहानी जान लेने के बाद पुलिस
के सामने अब इस बात की पूरी सम्भावना थी कि इस अपहरण के पीछे अजमल का ही हाथ हो
सकता है. कुसम वाले मामले में उसकी काफी बेज्जती हुई थी. यहाँ तक कि उसे अपना घर
छोडकर भागना पड़ा था. बदला लेने के लिए वह कुछ भी कर सकता था. कन्नू के परिवार के
पास अजमल का फोन नम्बर था. पुलिस ने वह नम्बर लेकर सर्विलांस पर डाल दिया और उसकी
लोकेशन को ट्रेस करने की कोशिश करने लगे थे. कन्नू को किये गए पहले फोन के दो दिन
बाद उसे दोबारा फोन कर पैसों की मांग की गई. इस बार फोन कैथल- हरियाणा से आया
था. पुलिस टीम फोन की लोकेशन ट्रेस करती जब कैथल पहुँच तो कन्नू को दिल्ली से फोन
किया गया. इस बार फोनकर्ता ने रुपयों की मांग के साथ कुसम से बात करने की इच्छा
प्रकट की तो स्पष्ट हो गया कि लल्लू के अपहरण में पक्का ही अजमल का हाथ है. इसके
बाद वह कन्नू को बार-बार फोन ना करके मेसेज करता रहा था. अजमल को पकडऩे के लिए
पुलिस की टीमों ने कैथल व दिल्ली में एक साथ 15 जगह रेड की लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा. अब तक की जांच
में सामने आया कि जो बैंक खाता नंबर उसने फिरौती के पैसे डलवाने के लिए दिया था,
जो लुधियाना के एक युवक का है. और उस युवक से अजमल की दूर-दूर तक
कोई जान पहचान नहीं थी. फिर भी पुलिस ने उसे शक के दायरे में ही रखा था. आखिर
लम्बे चले इस चोर-सिपाही के खेल के बाद पोलिस ने अजमल के फोन लोकेशन का पिचा करते
हुए उसे 8 अगस्त को दिल्ली से धर दबोचा था. अगले दिन 9 अगस्त को अजमल को अदालत में
पेशकर पुलिस ने लल्लू की बरामदगी और आगामी पूछताछ के लिए 5 दिन के पुलिस रिमांड पर
ले लिया था.
पूछताछ के दौरान अजमल ने बताया कि
लल्लू की हत्या उसने उसी दिन 27 जुलाई को ही कर दी थी और उसकी लाश को सतलुज दरिया में बहा दिया था. उसने बताया कि मोहल्ले से बेज्जत होने
के बाद वह अपनी बहन के पास कैथल चला गया था.पर कुसम बिना उसका मन नहीं लग रहा था.
उसने कुसम से प्यार किया था और वह भी उसे प्यार करती थी पर अब उसने बेवफाई की थी
सो उसका मन बार-बार कहता था कि कुसम और उसकी माँ से बेज्जती का हिसाब लिया जाये.
सो लुधियाना छोड़कर जाने के डेढ़ महीने बाद 27 जुलाई को वह ट्रेन द्वारा लुधियाना
आया. दोपहर को जब लल्लू स्कूल से वापस घर जा रहा था तो उसने उसे रोककर साथ चलने को
कहा लेकिन उसने इंकार कर दिया और घर जाकर अपनी बहन को उसके वहां आने की सूचना दी. बाद
में जब लल्लू खेलने के लिए घर से बाहर निकला तो वह उसे कहीं घुमाने का लालच देकर आटो
में बिठाकर सतलुज दरिया पर ले गया था. दरिया पर पहुंचकर अजमल ने लल्लू को दरिया
में नहाने और तैरना सिखाने के लिए उकसाया. जब लल्लू नहने के लिए तैयार हो कपड़े उतर
दरिया में अजमल के साथ घुसा तो तभी अजमल ने नहाते समय लल्लू की गर्दन पकड़कर उसे
पानी में डुबोकर मार दिया और उसकी लाश को पानी में बहाकर बस द्वारा वापस कैथल और
बाद में दिल्ली चला गया था. वहीँ से ही वह कन्नू को फोन द्वारा एसएमएस भेजा करता
था.
अजमल की निशानदेही में पुलिस ने सतलुज
दरिया में गोताखोरों की टीम को उतरा. पर लल्लू की लाश नहीं मिली थी. बरसातों के दिन
होने के कारण दरिया में पानी का तेज बहाव था, ऐसे में सम्भव है लाश पानी में कहीं
दूर तक निकल गई हो. पोलिस कई दिनों तक लल्लू की लाश को दूर-दूर तक दरिया में
तलाशती रही थी. पर लाश नहीं मिली थी. रिमांड की अवधि ख़त्म होने के बाद दिनांक-13
अगस्त को अजमल को पुन: अदालत में पेश कर न्यायिक हिरासत में जिला जेल भेज दिया गया
था. कथा लिखे जाने तक घटना के एक माह गुजर जाने पर भी पुलिस और लल्लू के परिजनों
को उसकी लाश नहीं मिली थी. खेल-खेल में लल्लू की गुमशुदगी से शुरू हुआ यह ड्रामा
अंत में इतने भयानक अंजाम तक पहुंचेगा इस बात की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी.
( पुलिस सूत्रों पर आधारित कथा का नाट्य रुपान्तरण- कुसम नाम काल्पनिक है.)
( पुलिस सूत्रों पर आधारित कथा का नाट्य रुपान्तरण- कुसम नाम काल्पनिक है.)
--साहिल कपूर



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