--मासूम की हत्या में तीन को फांसी--
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शिमला का बहुचर्चित युग गुप्ता अपहरण
हत्याकांड. एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला
जिसका राज्य ही नहीं पूरे देश
को
पिछले 18 महीनों से इन्तजार था.
फैसले को सुनने के लिए हिमाचल के
माननीय मुख्य
मंत्री जयराम ठाकुर भी
अदालत में मौजूद थे.
जिला एवं सत्र न्यायाधीश शिमला वीरेंदर सिंह की अदालत में आज लोगों की
बेअंत भीड़ थी, देखकर ऐसा लगता था जैसे पूरा शिमला शहर ही वहां उमड़ पड़ा हो. अदालत
परिसर के अंदर व बाहर सुरक्षा के कड़े
प्रबंध किए गए थे, और अतिरिक्त सुरक्षाबल तैनात किया गया था.
आज 4 वर्षीय युग गुप्ता के अपहरण एवं हत्याकांड
का फैसला सुनाया जाना था. यह अपहरण 4 करोड़ रूपए की फिरौती के लिए किया गया था बाद
में फिरौती की रकम ना मिलने के कारण मासूम की हत्या कर दी गई थी. युग गुप्ता के
परिजनों के अलावा पूरे राज्य को अदालत के इस फैसले का पिछले 18 महीनों से इंतज़ार था.
देश भर में इस घटना की चर्चा हुई थी. यह शायद देश मात्र एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला था
जिसको सुनने के लिए हिमाचल के माननीय मुख्य मंत्री जयराम ठाकुर भी अदालत में मौजूद
थे.
14 अप्रैल 2014 को राजधानी शिमला के रामबाजार से एक व्यापारी विनोद कुमार गुप्ता का 4
साल का बेटा युग लापता हो गया था. विनोद गुप्ता शहर के माने हुए
व्यपारी थे, उनकी शहर में किराने की थोक दुकाने और गारमेंट का बिजनेस था. स्थानीय सदर
थाना पुलिस ने मामले की जांच शुरू की, लेकिन कोई सफलता नहीं
मिली और नगरवासियों का आक्रोश देखते हुए बाद में यह मामला सीआईडी को सौंप दिया गया
था.
विनोद कुमार गुप्ता का बेटा युग 14 जून 2014 को अचानक लापता हो
गया था. 27 जून को जिस दिन युग का जन्म दिन था उस दिन विनोद
गुप्ता के घर एक बॉक्स आया जिसमें युग के कपड़े थे जो उसने लापता होने वाले दिन
पहने हुए थे. बाक्स के साथ एक पत्र था जिसमें युग को वापिस लौटने के बदले 3
करोड़ 60 लाख रुपये की मांग की गई थी. यह पैसे
उनके नौकर हरिओम के माध्यम से अम्बाला में देने को कहा गया था. इस बाक्स के मिलने
से यह बात साबित हो गई थी कि युग का अपहरण फिरौती के लिए किया गया था. एक सप्ताह
बाद फिर एक पत्र आया उसमें 4 करोड़ रुपये की मांग की गई थी.
उसके बाद फिर एक पत्र आया जिसमें 10 करोड़ रुपये मांगे गये थे,
लेकिन जब उन्होंने पैसे नहीं दिए तो घटना के 3 महीने बाद एक और पत्र आया जिसमें दोबारा 4 करोड़
रुपये की मांग की गई थी. यह आखरी पत्र था. इसके बाद यह मामला जब सीआईडी के पास
ट्रांसफर हो गया तो विनोद गुप्ता को पत्र आने भी बंद हो गये थे. सीआईडी की जाँच भी
लगभग 2 वर्ष तक चलती रही थी. पर अभी तक ऐसा कोई सुराग उनके हाथ नहीं लगा था जिससे
सीआईडी अपहरणकर्ताओं तक पहुंच पाती. पहले इस मामले की जाँच सीआईडी के डीएसपी
भूपिंदर बरागटा के नेतृत्व में गठित एक टीम द्वारा की जा रही थी. जब शहर में जनता
का आक्रोश भड़का और मामले की गूँज विधानसभा से होते हुए पार्लियामेंट तक जा पहुंची
तो सीआईडी के डीआईजी विनोद धवन ने इस मामले में हस्तक्षेप कीया. डीआईजी विनोद धवन
की निगरानी में युग मामले ने रफ्तार पकड़ी और यहीं से एक- एक अनसुलझी कड़ी को
जोड़कर मामले की तह तक पहुंचा जा सका था. एसपी क्राइम अशोक कुमार, डीएसपी भूपेंद्र बरागटा, सब इंस्पेक्टर सुरेश कुमार,
एएसआई राजेश कुमार, एएसआई अनिल, हेडकांस्टेबल रवि, हेडकांस्टेबल उमेश्वर सिंह,
कांस्टेबल दीपक के अलावा एफएसएल के डायरेक्टर डा. अरुण शर्मा,
डा. जगजीत सिंह, डा. संजीव कुमार और डा. बी
पटियाल ने क्राइम सीन विजिट में साइंटिफिक तरीके से सबूतों को एकत्रित करना शुरू किया
था. सीआइडी ने कई संदिग्ध लोगों के नार्को टेस्ट भी करवाए थे. जिन में से एक विनोद
गुप्ता का नौकर हरी ओम भी था. क्योंकि अपहरणकर्ताओं ने जब पहली बार फिरौती की मांग
की थी तो अम्बाला में रकम पहुँचने के लिए उन्होंने हरी ओम को चुना था. हरी ओम के
नार्को टेस्ट के दौरान गुप्ता परिवार का नौकर बार-बार चंद्र शर्मा का नाम ले रहा
था. सीआईडी को संदेह हो गया था किसी चन्द्र शर्मा का इस मामले से जरूर कोई वास्ता
है, लेकिन चन्द्र शर्मा कौन है, कहाँ रहता है. यह सीआईडी टीम को नहीं पता था पर
उन्होंने चन्द्र शर्मा की तलाश शुरू कर दी थी. इतेफाक से उन्हीं दिनों अगस्त 2016
में न्यू शिमला में एक चोरी के मामले में चन्द्र शर्मा का नाम आया था. इसके साथ दो
और लोगों के भी नाम थे. तेजिंदरपाल सिंह और विक्रांत बक्शी. जब तीनों आरोपियों का
नाम सामने आया तो शक यकीन में बदल गया. तीनों के मोबाइल खंगाले गए. इस बीच
विक्रांत बख्शी के मोबाइल से युग की एक 60 सैकिंड की क्लिप और फोटो बरामद हुई. इसके
बाद तेजिंद्र और चंद्र शर्मा को गिरफ्तार किया गया लेकिन इन्हें जमानत मिल गई.
सीआईडी ने विक्रांत पर शिकंजा कसा तो उसने युग के अपहरण की सारी बात बता दी. इसके
बाद एक बार फिर तेजिंद्र और चंद्र को हिरासत में लिया गया. चंद्र, तेजेंद्र व विक्रांत से बरामद मोबाइल फोनों को
सीआइडी ने कोर्ट के माध्यम से अपने कब्जे में लेकर उनका डाटा फॉरेंसिक जांच में पूरा डाटा रिट्रीव
करवाया और युग के अपहरण का एक बड़ा सुबूत सीआइडी के हाथ
आ गया था. पता चला कि वे लोग बच्चे का वीडियो व ऑडियो
बनाते थे जो मोबाइल फोन में थे. पकड़े जाने के डर से
उन्होंने वीडियो विनोद को भेजे नहीं थे. इसके आधार पर
दोषियों की निशानदेही पर उस जगह छापा मारा गया जहां युग को अपहरण के दौरान कमरे में रखा गया था, वहां की तलाशी ली गई. सीआइडी की एसआइटी के साथ
फॉरेंसिक टीम भी मौजूद रही थी. वहां से ट्रेसिंग पेपर, अन्य पेपर, कोल्ड ड्रिंक व बैड बॉक्स में निशान पाए गए थे. इसके आधार पर दोषियों की
गिरफ्तारी हुई. 20 अगस्त 2016 को
विक्रांत और 22 अगस्त को तेजेंदर और चंदर शर्मा को पकड़ा गया था.
4वर्षीय मासूम युग गुप्ता हत्याकांड का सबसे दर्दनाक पहलू अपराधियों द्वारा वारदात को
अंजाम देने का रहा था. रामबाजार स्थित घर से करीब तीन किलोमीटर दूर युग को शराब पिलाने के बाद पत्थरों से बांध कर केलेस्टेन क्षेत्र में स्थित नगर निगम के पानी
के टैंक में जिंदा फेंक दिया गया था. हत्यारों ने ऐसा
फिरौती न मिलने के गुस्से में किया था. टैंक में युग की
किस प्रकार तड़प-तड़प कर मौत हुई होगी इस बात की कल्पना मात्र से ही दिल दहल उठता
है. उसका शव टैंक में ही पड़ा सड़ता रहा था. इस टैंक से शिमला के कई हिस्सों
केलेस्टन व भराड़ी को पेयजल की सप्लाई की जाती है. करीब 25
हजार लोगों ने इस टैंक का पानी 2 वर्ष तक पीया था. उन्हें मालूम नहीं था कि टैंक में बच्चे का शव
है. ऐसा सरकारी तंत्र की लापरवाही से हुआ कि दो साल तक
युग का शव टैंक में ही पड़ा रहा और किसी को खबर ही नहीं
लगी थी. बाद में नगर निगम कर्मियों ने टैंक की सफाई की
तो युग का कंकाल बरामद हुआ. युग की हत्या ने सरकारी
तंत्र के मुंह पर भी जोरदार तमाचा मारा था. कागजों में
टैंकों की सफाई हर छह महीने में होती रही थी मगर शव
बरामद नहीं हुआ. नगर निगम के कनिष्ठ अभियंता की मौजूदगी
में टैंक की सफाई की जाती है मगर नगर निगम अधिकारीयों
की हकीकत युग का कंकाल बरामद होने के बाद सामने आई थी.
बहरहाल सीआईडी ने क्लस्टन टैंक के अंदर और बाहर से युग के अवशेष बरामद कर इस केस
को सुलझा दिया था.
22 अगस्त 2016 को भराड़ी टैंक से युग का कंकाल बरामद हुआ था. इसके बाद अवशेषों को
आईजीएमसी भेजा गया जहां डॉक्टरों ने इसे इंसानी बच्चे का कंकाल होने की पुष्टि की
और इसके बाद युग के माता-पिता के डीएनए से मिलान कराकर इस बात की पुष्टि की गई कि
बरामद कंकाल युग का ही है.
बाद में इस केस की सुनवाई के दौरान अदालत में भी वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर यह साबित कर दिया गया कि टैंक से मिला कंकाल युग का ही था. युग के अवशेषों को बतौर सबूत मालखाने में जमा करवा दिया गया था. युग के परिजनों को अपने बेटे युग की अस्थियाँ अंतिम संस्कार के लिए अब अदालत के आदेश पर ही मिलनी थी.
बाद में इस केस की सुनवाई के दौरान अदालत में भी वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर यह साबित कर दिया गया कि टैंक से मिला कंकाल युग का ही था. युग के अवशेषों को बतौर सबूत मालखाने में जमा करवा दिया गया था. युग के परिजनों को अपने बेटे युग की अस्थियाँ अंतिम संस्कार के लिए अब अदालत के आदेश पर ही मिलनी थी.
युग के माता पिता और दादा दादी अदालत के फैसले के बाद
युग का सात दिन तक रोजाना उत्पीड़न किया गया था. उसे जहां रखा गया,
वहां ट्रेसिंग पेपर व दूसरे कागजात भी
रखे गए थे. इस केस का मास्टर माइंड मुख्य दोषी चंद्र
शर्मा ने फॉरेंसिक साइंस का कोर्स किया हुआ है. इस कारण उसे पता था कि अगर ट्रेसिंग
पेपर पर फिरौती का पत्र लिखेंगे तो इससे हैंडराइटिंग मैच नहीं होगी. फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स ने विनोद को फिरौती के
लिए लिखे गए पत्रों से हैंडराइटिंग के नमूनों को मैच करके देखा था. पत्र चन्द्र
शर्मा ने ही लिखे थे.
मासूम युग की गुमशुदगी के रहस्य को
सुलझाने और आरोपियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने के लिए डीआईजी सीआईडी की टीम ने
रात-दिन एक किया था. कई बार ऐसा भी हुआ, जब जांच अधिकारियों के हौसले पस्त हुए, कई बार कमजोर
पड़े लेकिन हिम्मत नहीं हारी थी. इस स्थिति में वह हर बार उस चार साल के मासूम युग
की फोटो देखकर यह प्रण करते रहे कि इसके पीछे जो कोई भी हों, उन्हें पकड़कर ही दम लेंगे. आखिरकार टीम ने
कत्ल के तीनों आरोपियों को पकड़कर ही दम लिया था. इन सबके पीछे एडीजीपी सीआईडी
बीएनएस नेगी , डीआईजी सिक्योरिटी क्राइम रहे
दलजीत ठाकुर का भी अहम रोल रहा है, जिन्होंने टीम के हौसले
को कम नहीं होने दिया और हर संभव मदद दी थी.
25 अक्टूबर,
2016 को सीआईडी ने जिला एवं सत्र न्यायालय में आरोपियों के खिलाफ
चार्जशीट पेश कर दी थी. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सीआईडी ने चालान पेश
करने के साथ ही अदालत में अर्जी दाखिल करते हुए प्रार्थना की थी कि इस केस को
फास्ट ट्रैक कोर्ट में रखा जाये ताकि केस की सुनवाई हर रोज हो सके. 15 महीनों तक चले इस केस के ट्रायल में कुल 135 गवाह बनाये गये थे जिनमें से
105 गवाहों के ब्यान दर्ज किये गये थे.13 अगस्त और 21
अगस्त को सुनवाइयों के दौरान अदालत ने दोषियों के माता-पिता को तलब
किया गया था. न्यायाधीश के समक्ष बयान में परिजनों ने अपनी बीमारी का हवाला दिया
और दोषियों की सजा कम करने की गुहार लगाई. इस हत्याकांड को अंजाम देने वाले तीनों
आरोपी संपन्न परिवारों से ताल्लुक रखते हैं. दो आरोपियों के परिजनों की शिमला के
राम बाज़ार में किरयाने और गारमेंट्स की दुकानें हैं और वे पीड़ित विनोद गुप्ता के
पड़ोसी थे. अदालत में जज वीरेंद्र सिंह ने चार वर्षीय मासूम के हत्यारों को खड़े
होकर सजा सुनाई थी. एक एक कर तीनों
दोषियों की सजा का एलान करने में जज ने मात्र दस मिनट का वक्त लिया था. सजा पर
फैसला सुनाने के बाद जज वीरेंद्र सिंह ने कलम को तोड़कर पीछे की ओर फेंका और सीधे
अपने चैंबर की ओर चले गए थे.
तीनों दोषियों को जब अदालत के सामने पेश किया गया,
उस समय अदालत का माहौल बिल्कुल शांत था. अदालत ने एक एक कर तीनों को
फांसी की सजा सुनाने की प्रक्रिया शुरू की. सबसे पहले चंद्र शर्मा को फांसी की सजा
सुनाई गई. इसके बाद तेजिंद्र पाल और फिर विक्रांत बख्शी की सजा का एलान किया गया.
सजा सुनकर तीनों के चेहर पीले पड़ गए थे. चेहरों पर खौफ झलकता रहा. अदालत में
मौजूद सभी की नजरें उस समय जज और हत्यारों पर टिकी रहीं थी. हत्याकांड में दोषियों
की सजा पर 6 अगस्त 2018 को सुनवाई हुई. जिला एवं सत्र न्यायालय में युग हत्याकांड
के दोषियों की सजा पर एक घंटे तक बहस हुई, कोर्ट रूम में बंद
दरवाजे के भीतर बहस प्रक्रिया पूरी हुई. सजा पर हुई बहस
की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की गई थी. 6 अगस्त को हुई सुनवाई
में तीनों आरोपियों को दोषी करार देने के बाद अदालत ने 800 पन्नो का अपना फैसला
सुरक्षित रख लिया था. बहस के दौरान तीनों दोषियों के अलावा युग के पिता विनोद
गुप्ता भी मौजूद रहे.
न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह की अदालत ने इस अपराध को दुर्लभ में दुर्लभतम
श्रेणी का करार दिया था. युग हत्याकांड में अदालत ने आईपीसी की धारा 302, 120 बी हत्या और हत्या का षड्यंत्र रचने,
364-ए और 120-बी में फिरौती की मांग करने का
दोषी करार देते हुए तीनो दोषियों को मौत की सजा सुनाई थी, वहीं, धारा 347 में बंधक बनाने का दोषी पाए जाने पर एक साल
की सजा और बीस हजार जुर्माने की सजा सुनाई. जुर्माना अदा न करने की सूरत में तीन
माह की अतिरिक्त सजा सुनाई गईथी. अदालत ने तीनों को धारा 201 और 120-बी के तहत सुबूत नष्ट करने और षड्यंत्र रचने
का दोषी होने पर सात साल के कठोर कारावास, 50 हजार जुर्माने
की सजा सुनाई. जुर्माना अदा न करने पर छह माह के अतिरिक्त कारावास की सजा होगी.
वहीँ अदालत ने इन दोषियों को आईपीसी की धारा 506 और 120-बी के तहत धमकियां देने और षड्यंत्र रचने पर एक साल के कठोर कारावास और दस
हजार जुर्माने की सजा सुनाई. इसमें जुर्माना अदा न करने की सूरत में एक माह की
अतिरिक्त जेल होगी. फांसी की सजा सुनते ही तीनों हत्यारों के चेहरे पीले पड़ गए
थे. चार साल से न्याय का इंतजार कर रहे युग की मां पिंकी, पिता
विनोद कुमार और दादी चंद्रलेखा की आंखों से आंसू छलक पड़े थे. कोर्ट ने मौत की सजा
के आदेशों को कन्फर्मेशन के लिए उच्च न्यायालय भेज दिया गया था. वहीं, दोषियों को हाईकोर्ट में फैसले को लेकर अपील करने के लिए तीस दिन का समय
दिया है. भीड़ कम होने तक सुरक्षा कारणों और फैसले की प्रति देने के लिए दोषियों
को कुछ देर के लिए कोर्ट में रोका गया। इसके बाद पुलिस की कड़ी सुरक्षा के बीच
तीनों को अदालत परिसर से शाम को फिर कंडा जेल ले जाया गया. अदालत का यह है फैसला साढ़े
अठारह माह के भीतर आया था.
चार साल के युग के लिए मां-बाप ने सैकड़ों सपने देखे थे. जब भी कोई खिलौना युग ने
लेना होता था तो वे एकदम खरीद कर दे देते थे. एक दिन आंगन में खेलते हुए युग लापता हो गया था.
किसी ने नहीं सोचा था कि वह कभी लौटकर नहीं आएगा. जिस दिन युग लापता हुआ, मां उसी दिन से बेसुध सी हो गई. जिस दिन मां ने सुना कि युग इस
दुनिया में नहीं है तो वह गुमसुम रहने लगी. युग की मां भी अपने बच्चे की एक झलक देखना
चाहती थी लेकिन दरिदों ने उसे बेरहमी से मार दिया था.
मां की आंखें सिर्फ आंसुओं से भरी रहती थीं. घर में युग की एक छोटी सी फोटो को मां
हमेशा सीने से लगाए रखती थी. वह हर रोज भगवान से
प्रार्थना करती थीं कि उसके बेटे को मुक्ति देनी है तो हत्यारों को फांसी की सजा होनी चाहिए.जब भी
कोर्ट में पेशी होती तो पूरे परिवार को उम्मीद होती कि
हत्यारों को फांसी होगी. बुधवार को जब कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई तो बेटे की हत्या करने
वाले तीनों दरिंदे अदालत में उनके सामने थे. मां की
आंखों से एकदम आंसू निकल आए. उन्होंने कहा कि दोषियों को सजा सुनाकर युग के साथ इंसाफ हुआ
है. लेकिन वह दोषियों को कभी माफ नहीं करेंगी.
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय की बार एसोसिएशन के अध्यक्ष बीएम
चौहान ने कहा कि वह युग के हत्यारों का केस नहीं
लड़ेंगे. वह शिमला के नागरिक हैं और यह ऐसा जघन्य अपराध
है जिसकी घोर निंदा की जानी चाहिए. जहां तक हाईकोर्ट
बार एसोसिएशन का हत्यारों के पक्ष में पैरवी करने का सवाल है तो यह निर्णय समय आने पर बार हाउस लेगा.
उस समय हाउस के सामने मामला रखा जाएगा. प्रदेश का
नागरिक होने के नाते मेरा दायित्व है कि इस तरह के असामाजिक
तत्वों का पक्ष न लूं. मैं अदालत में ऐसे अपराधियों की
पैरवी नहीं कर सकता.
--हरमिंदर कपूर








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