*मौत की आहट*
मनिंदर और ननु के बीच सम्बन्ध निर्विघ्न
चलते रहे थे. इस बात की किसी को कानों कान खबर न थी. शायद दोनों के बीच मामी-भांजे
का रिश्ता और उम्र का एक अंतर था. ननु का दलजीत के घर काफी आना जाना था. किसी को
कभी इस बात का संदेह ही नहीं हुआ था कि मामी भांजे के रिश्ते की आड़ में उनके घर
क्या खेल चल रहा था-
आहट
होने पर दलजीत सिंह अपने बिस्तर से उठ बैठे थे. बेड पर बैठे ही उन्होंने अपने
चारों ओर नज़र दौड़कर देखा वहां कोई नहीं था. बाहर से कुतों के भौकने की आवाज़े
लगातार आ रही थी. अपने बेड से उठकर वह कमरे से बाहर आये तो उन्होंने एक परछाई को अपनी
बहु मनिंदर कौर के कमरे से बाहर निकल दीवार फांद भागते देखा था. ‘ कौन था वह,? क्या कोई चोर था या कोई दुश्मन. ‘ मन
ही मन दलजीत सिंह ने अपने आप से सवाल किया पर एकाएक उन्हें कोई जवाब नहीं सूझा था.
असमंजसपूर्णवह बहु मनिंदर के कमरे के पास पहुंचे तो देखा कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ
था. उन्होंने मनिंदर को जगाकर डांटते हुए कहा.
‘’ यह दरवाज़े खुले छोडकर क्यों सो रही हो.
जानती हो कोठी में कोई घुस आया था.
‘’ गलती हो गई पापाजी. बच्चों को सुलाते हुए
ना जाने कब मेरी भी आँख लग गई थी. आइन्दा इस बात का ध्यान रखूंगी.’’
मनिंदर कौर का उत्तर सुन दलजीत सिंह संतुष्ट होकर अपने कमरे
में जाकर दोबारा सो गए थे.
दलजीत सिंह मूलतः जिला टांडा के गाँव ज्ग्गोचक के मूल
निवासी थे. 65 वर्षीय दलजीत भारतीय से लगभग 12 वर्ष पहले रिटायर हुए थे. खुद सेना
में होने के कारण उन्होंने अपने बेटे ओंकार सिंह के युवा होने और अपनी पढ़ाई पूरी
करने के पश्ताश उसे भी भारतीय सेना में भर्ती करवा दिया था. इन दिनों ओंकार
श्रीनगर में अपनी
मनिंदर का प्रेमी दोषी राहुल उर्फ़ ननु
रेजिमेंट के साथ तैनात था. दलजीत सिंह की पत्नी का कई वर्ष पूर्व
ही निधन हो चुका था. बेटे को सेना में भर्ती करवाने के बाद दलजीत सिंह ने उसका
विवाह आज से लगभग 7 वर्ष पूर्व मनिंदर कौर के साथ कर दिया था. ओंकार और मनिंदर कौर
की दो संताने थी. बड़ी बेटी जैसमिन अब 5 वर्ष की हो चुकी थी. इस के पूर्व पहले दलजीत
सिंह गांव बहरामपुर में रहते थे. वहां उनकी कोठी बनी हुई है, लेकिन ओंकार की शादी के बाद मनिंदर के बार-बार कहने पर उन्होंने गुरदासपुर के थाना तिब्बड़
दोषियों को गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम
अंतर्गत
गाँव कोठे घराला, बाइपास स्थित स्कीम नंबर 7 की नई
कालोनी में कोठी बनवा ली थी. इस नये घर में उन्होंने दो साल पहले ही शिफ्ट किया था.
दलजीत सिंह का परिवार एक खतापीता परिवार था. उनके पास अपनी
कुछ जमीन भी थी. रिटायरमेंट के बाद उन्हें अच्छीखासी पेंशन भी मिलती थी. ओंकार का
वेतन भी अच्छा था. घर में किसी चीज़ की कमी न थी. उनके परिवार की दिनचर्या भी
सामान्य थी, दलजीत सिंह का अधिकांश समय गरुद्वारे में या घर पर वाहेगुरु का नाम
जपते गुजरता था. बहु मनिंदर सुबह सुबह घर का काम निपटाकर दिनभर बच्चों के साथ रहती
थी.
शादी का इतना अरसा गुज़र जाने के बाद आज से कुछ समय पहले से
उसके पांव लड़खड़ाने लगे थे यह सोहबत का असर था या उसकी अपने पति से जुदाई का मामला.
पर लगभग दो वर्षों से उसके सम्बन्ध एक 18 वर्षीय युवक राहुल उर्फ़ ननू के साथ बन गए
थे. वैसे दूर के रिश्ते में मनिंदर, ननु की मामी लगती थी.
ननु मंडी कोहलू वाली, बहरामपुर निवासी स्वर्गीय रमन शर्मा
का पुत्र था. रमन शर्मा की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी स्नेहलता ने ननु को अपने भाई
से गोद लिया था. स्नेहलता स्वंय पंजाब पुलिस में सब इंस्पेक्टर है और इं दिनों
थाना मुकेरिया में तैनात है. माँ के डयूटी पर चले जाने के बाद पीछे ननु अकेला रहता
था और इसी कारण ही वह छोटी उम्र से ही गलत संगत में पड़ गया था. जिस समय उसके
मनिंदर के साथ अवैध सम्बन्ध बने थे उस वक्त उसकी उम्र मात्र 16 वर्ष थी.
बहरहाल
मनिंदर और ननु के बीच सम्बन्ध निर्विघ्न चलते रहे थे. इस बात की किसी को कानों कान
खबर न थी. शायद दोनों के बीच मामी-भांजे का रिश्ता और उम्र का एक अंतर था. ननु का
दलजीत के घर काफी आना जाना था. उन्हें कभी इस बात का संदेह ही नहीं हुआ था कि मामी
भांजे के रिश्ते की आड़ में उनके घर क्या खेल चल रहा था. दलजीत सिंह को अपनी
बहरामपुर वाली कोठी बदलने के लिए भी मनिंदर ने ही मजबूर किया था, दरअसल उस इलाके
के लोगों को मनिंदर और ननु के अवैध रिश्तों का पता चल गया था इसी लिए अपने ससुर और
पति के सामने उसने जिद कर वह कोठी बदलने के लिए दबाव डाला था. नई आबादी की इस नये
घर में दूर-दूर आबादी होने के कारण उसे कोई रोक टोक नहीं थी, वह ननु के साथ अपना
खेल निर्विघ्न जरी रखे हुए थी. धीरे धीरे मनिंदर निडर होती चली गई थी, उसने अपने
ससुर की मौजूदगी में ही अब अपना खेल खेलना शुरू कर दिया था. दलजीत सिंह की मौजूदगी
में ही वह अपने प्रेमी के साथ दूसरे कमरे में बंद हो जाया करती थी.
एक दिन दलजीत को अहसास हुआ कि मनिंदर और ननु के बीच मामी
भांजे के रिश्ते के अलावा कुछ और भी है. इस बात का अहसास होते ही उसने दोनों पर
अपनी नज़र रखनी शुरू कर दी थी और फिर जल्दी ही उनके सामने दोनों के रिश्तों की
हकीकत खुल गई थी और उन्होंने एक दिन दोनों को आपतिजनक हालत में देख लिया था. अपनी
बहु मनिंदर को फटकार लगाने के बाद उन्होंने ननु का अपने घर आना-जाना बंद करवा दिया
था. पर फिर भी वह किसी ना किसी बहाने से उनके घर आया जाया करता था. इस बात का
जिक्र दलजीत ने अपने बेटे ओंकार को उसकी छुट्टियों के दौरान भी किया था. ओंकार ने
मनिंदर को प्यार से समझाते हुए कहा था कि ऐसी बातें उसे शोभा नहीं देती है, वह एक
अच्छे परिवार की बेटी और बहु है, मनिंदर ने भी भविष्य में ऐसी किसी गल्ती करने के
लिए माफी मांग ली थी पर पति के नौकरी पर लौटते ही वह सब कुछ भूल जाती थी.
बात आज से डेढ़ माह पहले की है. दलजीत सिंह ने इं दिनों ननु
का अपने घर आना एक दब से बंद करवा दिया था. उसने मनिंदर पर भी अपने पहरे बिठा दिए
थे. इस बात से गुस्साये ननु ने एक रात नन्नू ने उनके घर में आकर पत्थरमारी कर
खिड़कियों और गाड़ी के शीशे तोड़ दिए थे, दलजीत सिंह
ने इस बात की रिपोर्ट थाना तिब्बड़ में दर्ज करवाई थी और अभी वह मामला कार्रवाई के
अधीन है. इस बीच ओंकार सिंह छुट्टी पर अपने घर आया था. उसके आने के बाद ननु ने उस
ओर जाना बंद कर दिया था.
ओंकार
अपनी छुट्टियां पूरी करने के बाद दिनांक 15 जून को वापिस अपनी रेजिमेंट श्रीनगर
लौट कर गया था. ओंकार के अपनी डयूटी पर चले जाने के बाद मनिंदर ने ननु को फोन कर
अपने घर बुला लिया था. जिस वक्त ननु वह पहुंच, उस समय दलजीत घर पर नहीं था जब वह
वापिस घर लौटा तो उसे ननु के आने का पता चला था. उसने ननु की बहुत बेज्जती की और
मनिंदर को भी खूब फटकारा था, पर दोनों ने उसकी तनिक भी परवाह नहीं की थी बल्कि ननु
ने मनिंदर के साथ उसके कहने पर उसी के कमरे में रहना शुरू कर दिया था. यह बात
दलजीत को बड़ी नागवार गुजरी थी. उसने जब इस बेशर्मी बात का विरोध किया तो मनिंदर ने
सामने से लड़ना झगड़ना शुरू कर दिया था. बेबसी की हालत में पूर्व फौजी दलजीत सिंह ने
अपने बेटे ओंकार को फोन कर उसे मनिंदर का पूरा माजरा बताया. यह बात उन्होंने फोन
द्वारा अपने रिश्तेदारों और मनिंदर के मायके वालों को भी बताई थी, 16 जून की रात
ननु की ही बात को लेकर मनिंदर और दलजीत के बीच काफी झगड़ा हुआ था जो देर रात तक
चलता रहा था. अंत में मनिंदर अपने ससुर की परवाह ना करते हुए ननु को लेकर अपने
कमरे में सोने चली गई थी
दिनांक 17 जून की सुबह दलजीत सिंह ने अपने साले तरसेम सिंह
के पुत्र किरपाल सिंह को गुरदासपुर के गाँव किला नाथू सिंह फोन कर कहा कि उनकी बहु
मनिंदर उसके साथ लड़ाई झगड़ा कर रही है और वह आकर उसे समझाये. उस समय किरपाल अपने
खेतों में पानी लगा रहा था, अपने फूफा का फोन सुनने के दब उसने कहा था.
‘’ फूफा जी आप चिंता ना करे. मैं थोड़ा सा काम
खत्म कर जल्दी आता हूँ.’’ कहने को तो किरपाल सिंह ने अपने
फूफा से ऐसा कह दिया था पर वह अपने काम में ऐसा व्यस्त हुआ कि वह दलजीत के फोन
वाली बात भूल गया था. उसे इस बात का पता नहीं चल सका था उसके फूफा जी और भाभी
मनिंदर के बीच बाद में क्या हुआ था.
दिनांक
17 जून शाम 4 बजे ओंकार सिंह ने अपने पिता दलजीत सिंह और अपने बच्चों का हाल जानने
के लिए अपनी रेजीमेंट से फोन किया था. फोन की घंटी लगातार बजती रहती थी पर फोन
नहीं उठाया जा रहा था. ओंकार ने एक बार नहीं, कई बार थोड़े-थोड़े अन्तराल के बाद फोन
किया था पर हर बार ऐसा ही हुआ था. फोन किसी ने नहीं उठाया था. ओंकार सिंह को इस
बात की ज्यादा हैरानी थी कि पापाजी ना सही, पर मनिंदर भी फोन नहीं उठा रही थी.
काफी देर तक फोन कर परेशान होने के बाद उसने अपने मामा के लड़के किरपाल सिंह को फोन
कर बताया था ‘’ पापा जी उसका फोन नहीं उठा रहे है और वह
उनके घर जाकर पता लगाए कि सब खैरियत तो है.’’
तब किरपाल सिंह ने ही ओंकार को बताया था कि उसे दलजीत फूफा
का भी फोन आया था और उन्होंने मनिंदर के साथ झगड़ा होने की बात बताई थी. बहरहाल
किरपाल ने ओंकार को आश्वासन दिया था कि वह अभी जाकर देखता है और उसकी बात फूफा जी
से करवाता है.
ओंकार सिंह को बच्चों और पिता की बड़ी चिंता थी. किरपाल के
आश्वासन देने के बाद भी वह संतुष्ट नहीं हुआ था. उसने अपने घर के पास बने गुजरों
के डेरे पर फोन कर कहा कि वह उनके घर जाकर देखे वहां क्या हो रहा है. गुजर जिस समय
दलजीत के घर पहुंचा उस समय किरपाल भी वहां पहुंच चूका था. किरपाल और गुजर ने दलजीत
के कमरे में जाकर देखा तो सामने का दृश्य देख उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई थी. सामने
बैड पर दलजीत सिंह का खून से लथपथ शव पड़ा हुआ था. उनके सिर और अन्य शरीर पर चोट
लगी हुई थी जिनमें से खून रिस कर बिस्तर पर जम गया था. पास वाले कमरे में मिन्दर
और बच्चे बैठे थे. किरपाल ने मनिदर से इस विषय में पूछा तो उसने यह कहकर बात खत्म
कर दी थी कि उसे कुछ पता नहीं है. किरपाल सिंह के लिए यह बड़ी हैरानी की बात थी कि
घर में इतना बड़ा कांड हो गया और मनिंदर का कहना था कि उसे कुछ पता नहीं था. बहरहाल
किरपाल ने सबसे पहले घटना की सूचना थाना तिब्बड़ पुलिस को दी और बाद में अपने भाई
ओंकार सिंह को सूचित किया था.
घटना
की सूचना मिलते ही थाना तिब्बड़ के थानाध्यक्ष इं राज कुमार शर्मा एस.आई अमरीक
चाँद,ए.एस.आई सरबजीत सिंह, मसीह, हवलदार विजय सिंह के साथ मौका पर पहुंच गए थे.
मृतक दलजीत की लाश अपने कब्जे में लेकर उन्होंने करवाई शुरू कर दी. घटनास्थल का
मुआयना करने के बाद उन्हें लगा यह काम किसी घर के सदस्य या जानने वाले का हो सकता
है. क्योंकि हत्या का मकसद केवल दलजीत की हत्या करना ही था. लूटपाट या अन्य किसी
चीज के वहां कोई सबूत नहीं मिले थे. मनिंदर का कहना था इस घटना का उसे कुछ पता
नहीं है. इं राज कुमार ने डॉग स्क्वायड की टीम और फिंगरप्रिंट
एक्सपर्ट को भी घटनास्थल पर बुला लिया था. घटना की खबर मिलते ही जिला पुलिस
अधीक्षक हरचरण सिंह भुल्लर,एस.पी (डी) विपिन चौधरी और डी.एस.पी स्पैशल ब्रांच
गुरबंस सिंह बैंस भी मौका मुआयना करने वहां पहुंच गये थे. इं राज कुमार ने जब वहां
पर मौजूद 5 वर्षीय जैसमिन को अपने विश्वास में लेकर पूचा तो उसने सब सच बताते हुए
कहा था कि मामी और ननु अंकल ने दादा जी को मारा है. इस के बाद मनिंदर ने भी अपना
अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि उसने और उसके प्रेमी ननु ने ही मिलकर झगड़े के बाद
दलजीत सिंह की हत्या की थी. मनिंदर कौर से पूछने पर बताया कि उसने अपने ससुर को
झगड़े के बाद उसके सिर पर लोहे की रॉड मारकर कत्ल कर दिया है. वहीं, मनिंदर के दोनों बच्चे भी कह रहे थे कि घर में नन्नू आया था और उसके बाद
झगड़ा शुरू हुआ था. चश्मदीद गवाह जैसमिन के बयान और मनिंदर द्वारा अपना अपराध
स्वीकार करने के बाद थाना प्रभारी राजकुमार शर्मा ने इस अपराध को अपराध संख्या-
51/18 पर भारतीय दंड विधान सहिंता की धारा- 302/34 के अंतर्गत दलजीत सिंह की हत्या
का मुकदमा मनिंदर और राहुल उर्फ़ ननु के खिलाफ दर्ज कर मनिंदर को अपने ससुर की
हत्या के आरोप में तुरंत उसे गिरफ्तार कर लिया था. मनिंदर को अदालत में पेश कर उसे
दो दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया था.
थाना
प्रभारी राजकुमार शर्मा ने मृतक दलजीत सिंह का शव अपने कब्जे में लेकर सिविल
अस्पताल में पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. और फरार ननु की तलाश में छापेमारी शुरू
कर दी. अंत में ननु को पुलिस ने दिनांक 20 जून को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल
कर ली थी. उसे भी अदालत में पेश कर रिमांड पर लिया गया था रिमांड के दौरान पूछताछ
में ननु ने बताया कि मनिंदर के साथ उसके अवैध सम्बन्ध पिछले काफी समय से थे और
मृतक दलजीत सिंह इस बात का विरोध करता था और उसे और मनिंदर को बात- बात पर जलील कर
धमकी देता था कि यदि वह अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आयर तो वह उनका कच्चा चिठा सबके
सामने खोल देगा.
रविवार दिनांक 17 को जब वह मनिंदर के घर में आया तो दलजीत
सिंह ने इस बात का विरोध करना शुरू कर दिया और उसे देखते ही गाली गलौच करने लगा
था. इसी बात को लेकर दोनों पक्षों का आपस में झगड़ा होने लगा जिसके बाद आरोपी ननु
और मनिंदर ने मिलकर दलजीत सिंह के ऊपर तेजधार हथियार और लोहे की राड से हमला करके
उसे मौत के घाट उतार दिया. रिमांड के दौरान पुलिस ने दोनों की निशानदेही पर उनके
घर से लोहे की राड भी बरामद कर की थी जिससे उन्होंने दलजीत की हत्या की थी. तमाम पुलिस करवाई पूरी कर इं राज कुमार ने दोनों आरोपियों को पुन अदालत में
पेश किया जहाँ से उन्हें न्यायिक हिरासत में जिला जेल भेज दिया था,
(पुलिस सूत्रों पर आधारित कथा का नाट्य रुपान्तरण)
–साहिल कपूर







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